पिता का महत्व

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पिता का महत्व

By |2018-10-09T16:22:05+00:00October 9th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

एक जमाना था वो भैया, जब हम सीधे साधे थे,
बाबूजी के घर आने पे, हम बड़ा थर्राते थे|
हम बड़ा थर्राते थे, बंद क़िताब खुल जाती थी,
उनकी एक आवाज से ही, बोझिल ऑंखें थम जाती थी|
उनकी डाँट डपट में, बड़ा अजब नजारा था,
रहते थे हम सहमे सहमे, हिलता घर सारा था|
हिलता घर सारा था, सब अनुशाषित रहते थे,
गुस्सा आता था कभी, कभी प्यार से वंचित रहते थे,
पर जब में बाप बन गया, तब सब लीला समझ आ गयी,
बाबूजी की हर एक डाँट, अपना महत्व बतला गयी|
क्यों रहते थे वो अनुशाषन मैं, वो क्यों गुस्सा करते थे,
बिगड़ न जाऊं मैं कहीं, हर दम यही चर्चा करते थे|
याद बहुत आते हैं वो, याद आती हर एक नसीहत है|
सहेज के रख लिया हर एक डाँट, को मेरी यही वसीयत है|

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