मेट्रो का सफ़र

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मेट्रो का सफ़र

By |2018-10-14T10:47:35+00:00October 14th, 2018|Categories: व्यंग्य|Tags: , , |0 Comments

भाया एक दिन मेट्रो मैं क्या चढ़ गया,
मन बड़े ही असमंजस मैं पड़ गया|
बड़े अजब नज़ारे देखे,
हमने दिन मैं सितारे देखे|
लम्बी लम्बी कतारें देख, मन कुछ घबरा सा गया,
कुछ से हो गयी तकरारें, तो कुछ से टकरा सा गया|
सीधे खड़े नहीं हो सकते, बद्तमीज तक सुनना पड़ गया|
गुस्सा आया बहुत जोर का, पर मन ही मन मैं सड़ना पड़ गया|
काफी जद्दोजहद के बाद, हम मेट्रो में घुस पाए,
नज़र फैलाई दूर दूर तक, पर सीट नहीं मिल पाए|
कुछ सीटें आरक्षित थी, तो कुछ मानवता से वंचित थी,
खड़े दिखाई दिए बुजुर्ग, इंसानियत यूँ लज्जित थी|
बड़े बड़े बहाने देखे, सोते हुए कुछ जगते देखे,
बंद आँखों से हमने तो, कुछ मुस्कुराते चेहरे देखे|
एक पल को लगा था ऐसे, जैसे ये राजा की गद्दी है,
अपनेआप को आराम मिले बस, ये सोच बड़ी ही भद्दी है|
अरे कुछ तो थोड़ी शर्म करो, ऐसा क्या सुख मिल जायेगा,
दे दोगे सीट लाचार को, उसका दिल खिल जायेगा|

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