हे गोकुल के राजा, ओ मेरे प्यारे कृष्णमुरारी,
शरण तुम्हारी आये हैं, सुन लो एक अर्ज हमारी |
मारे होंगे पापी सतयुग के, पर कलयुग के बड़े अजीब हैं,
खंजर छुपा के रखते हैं, लगते जो अपने करीब हैं |
माना तुमने वध किया था, उस अधर्मी कंस का,
पर ये तो वो बिरले हैं, जो रखे दंश सर्प का |
अहंकार चूर किया हो तुमने, भले कालिया नाग का,
पर क्या हटा पाओगे ,भेद ज़ात पात के दाग का |
जानते हैं उठा लिया था, तुमने उस गोवर्धन पर्वत को,
पर क्या दूर कर पाओगे, मानव की बुरी नीयत को |
आना हैं तो आओ ऐसे, जैसे सारथी बने थे तुम अर्जुन के,
द्वेष मिटा दो, प्यार फैला दो, तुम फिर हर मानव जन के |

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