ज़िंदगी की कश्मकश

Home » ज़िंदगी की कश्मकश

ज़िंदगी की कश्मकश

By |2018-10-16T08:27:59+00:00October 16th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

ज़िंदगी की कश्मकश में कुछ ऐसा उलझे हम
कुछ दुनिया हमको भूल गयी और
कुछ दुनिया को भूल गए हम
कब दिन ढला कब रात आयी
दैनिक कार्य-पिटारो में अपनी सुध भी ना आयी
गमो में भी मुस्करा दिए
जान -बूझकर काँटों पर पग बढ़ा दिए
पर खुलकर कब हँसे
वो खिलखिलाहट तो भूल गए हम
जाने कैसी उलझी ज़िंदगी
सुलझाने में, ज़िंदगी को
और उलझती गयी ज़िंदगी
फ़र्ज़, क़र्ज़ और न जाने कितनी जिम्मेदारी
सीढ़ी दर सीढ़ी मंजिल चढ़ी ज़िंदगी
गिरकर फिसली, फिर उठ बढ़ चली ज़िंदगी
औरो को समझने में उलझे रहे
पर खुद को ही न समझे हम
ज़िंदगी की कश्मकश में कुछ ऐसा उलझे हम
खुशियां चारो ओर बिखरी थी
हर जगह मृगमरीचिका सा दौड़े
मन की ख़ुशी न देखी बाहरी चकाचोंध में उलझे हम
सबका साथ दिया, किसी को तनहा न छोड़ा
फिर भी क्यों तन्हाई से दो -चार हुए हम
बस एक ज़िद थी खुद से ही जीतने की
ना जाने क्यों खुद से ही हार गए हम

Say something
No votes yet.
Please wait...

About the Author:

Leave A Comment