तुम नहीं समझोगे 

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तुम नहीं समझोगे 

By |2018-10-18T23:33:36+00:00October 18th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

तुम नहीं समझोगे
क्या कहती है रात की तन्हाई
तारो की ख़ामोशी भी करती है बाते
तुम नहीं समझोगे
चाँद कैसे बिखेर देता है दूधिया हँसी
आसमां भी होता है व्याकुल
धरती से एक मुलाकात के लिए
पर तुम नहीं समझोगे
सुबह की ठंडी हवा जब
तन को छूकर गुजरती है
पत्तों पर ओंस की बुँदे जब चमकती है
चिड़िया भी ची ची कर कुछ गाती है
फूल भी हँसते है और
हवा भी गुनगुनाती है
पर तुम नहीं समझोगे
बच्चों की मासूम हंसी
उनकी तोतली बोली
उनकी आँखों में तैरते सपने
बारिश की बूंदो को
तुम नहीं समझोगे
छोटी छोटी बाते कितनी खुशिया देती है
एक ज़रा सी बात आँखे नम कर देती है
कभी कभी आँखे भी कुछ कहती है
पर इन आँखों की जुबां को
तुम नहीं समझोगे
तुम नहीं समझोगे
क्युकी तुम कविता नहीं लिखते —

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