तेरे बेगैर जग सुना लगता है
बस तेरी कमी खलती है
खुश रहूं या गम में रहूं
तुम्हारी कमी महसूस होती है।

वर्षों से जैसे तेरा ही इंतजार हो
मेरा मन बिन तेरे कही नही
लगता है तेरे दिल मे मेरा जैसे
बसेरा हो सदियों से ऐसा लगता है।

मेरे आंखों को तेरे आने का और
दीदार का जैसे जुनून सवार हो
हर क्षण तेरी जाने की आहटें सुनाई
दिया मुझे अब आने का आहट सुनाई!

प्रेम बेख़बर इस संसार से तुम हो
मुझे पुनः तेरी दिल्लगी और तेरी
वफ़ा का तलबगार है अपनी हाजिरी
मेरे दिल मे दस्तक बन के दे जा!

समुंद्र से बढ़कर गहरा मेरा प्यार है
जहरीले सांप के नाश की तरह तेरी
मोहब्ब्त मेरे नश में दबा पड़ा है
जो क्षण-क्षण लहू में तैर रही है!
– प्रेम प्रकाश
पीएचडी शोधार्थी
रांची विश्वविद्यालय
रांची, झारखंड, भारत।

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