चाहे कोई देवदास कहें, चाहें कोई पागल प्रेमी कहें,
इसलिए मैं आशिक हूं शायद! इसलिए मैं आशिक हूं

ख्वाबों की नगरी में तुम हो, मैं अंधेर नगरी में शायद,
मगर मैं तेरी बेताबी को समझता हूं तेरे मन को शायद!

सोनपरी की कहानी भी पुरानी हो गई मगर आज
भी सुनहरी मछली मुझे अच्छी लगती है शायद!

संसार मे सभी लोग मुझे बेवफा नाम से संबोधन
करते हैं शायद इश्लिए आज मेरी आंखें नम है!

नदी में भी आत्मा होती है परंतु वह मरती नही
मेरी आत्मा तुममें बसी मैं चाह कर मर नही सकता

मेरी इस लाचारी को सोचा था तुम समझोगी
मगर तुमनें भी मेरे हालात पर गौर नही किए!

मदहोश था मैं तेरी मोहब्ब्त में ए-प्रेम वर्णा
प्यार में मेरी नईया भी पार हो जाता !!
– प्रेम प्रकाश
पीएचडी शोधार्थी
रांची विश्वविद्यालय
रांची, झारखंड, भारत।

No votes yet.
Please wait...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *