क्या आपको भी हिंदी बोलने मैं शर्म आती है?

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क्या आपको भी हिंदी बोलने मैं शर्म आती है?

By |2018-10-15T22:10:11+00:00October 15th, 2018|Categories: अन्य|Tags: , , |0 Comments

बहुतों को आती है इसलिए सोचा आपसे से भी पूछ लूँ। पिछले 7 वर्षों में अमेरिका के अलग अलग राज्यों मैं रहने का मौक़ा मिला, दुनिया भर के लोगों से बातचीत कर उनके संस्कृति के बारे में जाना। किसी को भी ये बताने की ज़रूरत नहीं पड़ी की मैं हिंदुस्तान से हूँ जहाँ की राष्ट्रभाषा हिंदी है। नमस्ते, शुक्रिया, आप कैसे हैं?, जैसे आम बोलचाल वाले शब्द बोलना उन लोगों के लिए आम बात है। कुछ लोग तो उत्तर और दक्षिण भारत में भी भेद कर सकते हैं, फिर भी “आप कैसे हैं?” बोलने से नहीं चूकते हैं क्यूँकि उन्हें अंदर की बात का अंदाज़ा नहीं है। 

जब विदेशी आप के राष्ट्रभाषा का सम्मान करें तो इससे अच्छी बात कुछ हो सकती है भला? मेरी आँखें उस समय खुली की खुली रह गयीं जब मैंने नेपर्विल ( शिकागो का उपनगर जो illinios राज्य का एक शहर है) के पब्लिक लाइब्रेरी में मुंशी प्रेमचंद की “गोदान” और “ठाकुर का कुआँ” देखी। पहले तो यक़ीन ही नहीं हुआ, मैंने अगले २० मिनट मैं पूरी की पूरी लाइब्रेरी खंगाल डाली। नेपर्विल लाइब्रेरी मैं हिंदी का एक पूरे का पूरा सेक्शन था, सब कुछ तो था वहाँ किताबें, पत्रिका, सीडी, ब्लू-रे, इत्यादि।

बहुत ही अच्छा लगा वो सब देखकर। यक़ीन ना हो तो इस लिंक पर क्लिक करके देख लें
http://southasia.typepad.com/…/wonderful-public-libraries-o…

इससे पहले भी मैं कई अमेरिकी राज्यो के लाइब्रेरी मैं जा चुका था लेकिन कभी हिंदी की किताबें नहीं देखी थीं। आपको जान कर ख़ुशी होगी की और भी कई अमेरिकी राज्य हैं जहाँ पत्राचार हिंदी और अंग्रेज़ी दोनो माध्यम में होता है।

अभी पिक्चर ख़त्म नहीं हुई है, हज़ारों उदाहरण हैं। आपको रूबरू करवाते हैं प्रोफ़॰ डॉ॰ रॉफ़ल इयान बाबू से जो मेल्बर्न (ऑस्ट्रेल्या) के एक विश्वविद्यालय में हिंदी के प्रफ़ेसर हैं।

दुःख तब होता है जब उन भारतीयों से मिलता हूँ जिन्हें हिंदी भाषा से दुर्गन्ध आती है, ख़ासकर उनसे जो ख़ुद हिंदी भाषी राज्यों से सम्बंध रखते हैं, वहैं पैदा हुए, खेले-कूदे, पले-बढ़े। आप एक क्या दस भाषाएँ बोलिए, लिखिए। लेकिन हिंदी से नफ़रत क्यूँ।

आजादी मिलने के दो साल बाद 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में एक मत से हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया था और इसके बाद से हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।

हिंदी सरल नहीं है इसलिए कई स्कूल मैं ऑप्शनल बना दिया गया है। हमारे देश के कुछ ख़ास तबके के लोगों को अंग्रेज़ी कीड़े ने काट खाया है और उन्हें हिंदी गँवार लगने लगी है। हिंदी की हालत बद से बदत्तर होती जा रही है जहाँ लगभग 77% प्रतिशत लोग हिंदी पढ़ते, बोलते, लिखते और समझते हैं।

क्या कोई हल है इस समस्या का?

शायद जागरूकता या कुछ और ?

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