एक सेहतमंद महिला का घर बस स्टॉप से बामुश्किल 1 किलोमीटर था, फिर भी रोज दोपहर वो बस से उतर कर तीन पहिये वाले रिकशे से घर तक जाती थीं।

वैसे तो यह उनका निजी मामला था लेकिन फ़िर भी हिम्मत करके हमने एक दिन पूछ ही लिया।
मैडम अगर बुरा न माने तो एक बात पूछ सकता हूँ?
हाँ हाँ कहिये।
मैडम आपका घर बस स्टाप से इतना करीब है, आप अगर चल कर जाएं तो आपकी सेहत भी ठीक रहेगी और पैसे भी बचेंगे। रोज रोज आने जाने में क्यों पैसे खराब करती हैं?
जवाब लाजवाब था।
जी जनाब! एकदम सही फरमाया आपने, रोज के तीस रुपये खर्च होते हैं और महीने के लगभग 1000 ₹।
और मैं जान बूझ कर ऐसा करती हूँ। वो लोग दिन भर मेहनत करके रोजी कमाते हैं भीख नही मांगते, कुछ रुपयों के लिए कीच कीच नही करते, पसीना बहाते हैं। ऐसे में अगर हम लोग सक्षम है तो क्यों ना अपरोक्ष रूप से उनकी मदद करें।
मेरे पास कोई जवाब नहीं था, सिर्फ उन लोगों का चेहरा आँखों के सामने घूम रहा था जो लोग महंगे रेस्टोरेंट्स में 500 ₹ का टिप देने में गर्व महसूस करते हैं लेकिन सब्जी वालों से 5 ₹ के लिए भी लड़ मरते हैं।
परोपकार, नैतिक ज़िम्मेदारी, जरूरतमंदो की मदद, बड़ों का आदर …
सब खोता जा रहा हैं आगे बढ़ने  और माडर्न बनने के इस दौर में। फिर भी कुछ लोग हैं जो उम्मीद को ज़िंदा रखे हैं।
वाह रे माडर्न समाज!

अपने लिए तो सब जीते हैं, मजा तो दूसरों के लिए जीने में है।

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