दो चार हाथ को बस

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दो चार हाथ को बस

By |2018-10-18T23:51:59+00:00October 18th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

जब पति और पत्नी ज्यादातर समय लड़ने और झगड़ने में लगाते हैं तो उनकी इस लड़ाई का उनके बच्चों पे बहुत बुरा असर पड़ता है| घरेलु तनाव का माहौल संतानों की प्रगति में बहुत बड़ी बाधा उत्पन्न करता है| मैंने ये हास्य कविता घरेलु तनाव के माहौल में पल रहे एक बच्चे की नजरिये से लिखा है| मैंने जानबुझकर हल्के फुल्के अंदाज में अपनी कविता को प्रस्तुत किया है ताकि जो कहना चाहता हूँ वो पाठक गण तक हल्के फुल्के अंदाज में पहुँच सके| आशा करते हूँ हमेशा की तरह पाठक गण मेरी इस हास्य कविता का रसास्वादन करेंगे|

क्या कहूँ जब पापा और माँ झगड़ रहे थे,
बिजली कड़क रही थी,बादल गरज रहे थे|

जमने की थी बस देरी, औकात की लडाई,
बेचारे पूर्वजों के, पुर्जे उखड रहे थे|

इधर से दनादन थप्पड़, टूटी थी चारपाई,
उधर से भी तो चौकी, बेलन बरस रहे थे|

अरमान दुश्मनों की, सुनी पड़ी थी कबसे,
बारिश जो रही थी, वो भींग सब रहे थे|

मिलता जो हमको मौका, लगाते हम भी चौका,
बैटिंग तो हो रही थी, हम दौड़ बस रहे थे|

बहादुरों के बच्चे, आखिर में सीखते क्या,
दो चार हाथ को बस, हम भी तरस रहे थे|

– अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

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About the Author:

जीवन में बहुत सारी घटनाएँ ऐसी घटती है जो मेरे ह्रदय के आंदोलित करती है. फिर चाहे ये प्रेम हो , क्रोध हो , क्लेश हो , ईर्ष्या हो, आनन्द हो , दुःख हो . सुख हो, विश्वास हो , भय हो, शंका हो , प्रसंशा हो इत्यादि, ये सारी घटनाएं यदा कदा मुझे आंतरिक रूप से उद्वेलित करती है. मै बहिर्मुखी स्वाभाव का हूँ और ज्यादातर मौकों पर अपने भावों का संप्रेषण कर हीं देता हूँ. फिर भी बहुत सारे मुद्दे या मौके ऐसे होते है जहाँ का भावो का संप्रेषण नहीं होता या यूँ कहें कि हो नहीं पाता . यहाँ पे मेरी लेखनी मेरा साथ निभाती है और मेरे ह्रदय ही बेचैनी को जमाने तक लाने में सेतु का कार्य करती है.

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