जब पति और पत्नी ज्यादातर समय लड़ने और झगड़ने में लगाते हैं तो उनकी इस लड़ाई का उनके बच्चों पे बहुत बुरा असर पड़ता है| घरेलु तनाव का माहौल संतानों की प्रगति में बहुत बड़ी बाधा उत्पन्न करता है| मैंने ये हास्य कविता घरेलु तनाव के माहौल में पल रहे एक बच्चे की नजरिये से लिखा है| मैंने जानबुझकर हल्के फुल्के अंदाज में अपनी कविता को प्रस्तुत किया है ताकि जो कहना चाहता हूँ वो पाठक गण तक हल्के फुल्के अंदाज में पहुँच सके| आशा करते हूँ हमेशा की तरह पाठक गण मेरी इस हास्य कविता का रसास्वादन करेंगे|

क्या कहूँ जब पापा और माँ झगड़ रहे थे,
बिजली कड़क रही थी,बादल गरज रहे थे|

जमने की थी बस देरी, औकात की लडाई,
बेचारे पूर्वजों के, पुर्जे उखड रहे थे|

इधर से दनादन थप्पड़, टूटी थी चारपाई,
उधर से भी तो चौकी, बेलन बरस रहे थे|

अरमान दुश्मनों की, सुनी पड़ी थी कबसे,
बारिश जो रही थी, वो भींग सब रहे थे|

मिलता जो हमको मौका, लगाते हम भी चौका,
बैटिंग तो हो रही थी, हम दौड़ बस रहे थे|

बहादुरों के बच्चे, आखिर में सीखते क्या,
दो चार हाथ को बस, हम भी तरस रहे थे|

– अजय अमिताभ सुमन:सर्वाधिकार सुरक्षित

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