एक रोज यमलोक में चर्चा हो रही थी,
राम और रावण में कुछ वार्ता हो रही थी|
रावण जोर जोर से हॅसने सा लगा,
श्री राम पे ताने कसने सा लगा|
बोला प्रभु मेरी तो लंका जला डाली थी आपने,
जुदा कर दिया था जब माँ सीता को आपसे|
पर क्या सच में मेरा इतना कसूर था,
जो मेरे घमंड को कर दिया चकनाचूर था|
उनको बाइज्जत वाटिका में ही तो बिठाया था,
क्या बुरी नजर से मैंने उनको हाथ भी लगाया था|
लिया था बदला मैंने अपनी बहन की बेइज्जती का,
क्या इतना भी हक़ नहीं बनता एक भाई का|
अच्छा छोड़ो अब बताओ कलयुग में क्या नहीं हो रहा है,
बहनों के साथ सामूहिक बलात्कार क्या सही हो रहा है|
छेड़छाड़, भ्रूणहत्या और सरेआम हो रहा नारी उत्पीड़न है,
और दिखावे को ये कलयुगी लोग कर रहे मेरा दहन है|
क्या जान पा रहें हैं ये महत्व मेरे उस सर्वविनाश का,
अयोध्या में फैले हुए उस मंगलमय प्रकाश का|
युद्धभूमि में जब कर डाला था ख़ात्मा आपने उस बुराई का,
जब लहराया था परचम, आपने एक नयी अच्छाई का|
चलो प्रभु फिर आ जाओ एक नए अवतार में,
बन जाओ फिर तारनहार और सद्गुण फैले संसार में|

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