मेरे तन से जन्में अब हमें सठियाया कहने लगे
अब मैं वृद्ध हो गया हूं इन्हें लगता है मैं बोझ हूं

जो मैं तुम्हें अपना खून से सींचा हूं वो आज हमें
दो वक़्त की रोटी देने से लाचार हो गए है ऐसा?

ऐसे मेरे साथ वर्तवा क्यों कर रहे जिन्हें हमनें वर्षों
से पालपोश कर जीने का तौर तरीका सिखया वें!

पूरे संसार का यही हाल है वर्णा आज न ही वृद्ध
आश्रम होते न ही मौत से पहले का जीवन ए प्रेम!
– प्रेम प्रकाश
पीएचडी शोधार्थी
रांची विश्वविद्यालय
रांची, झारखंड, भारत।

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