आजकल नयनों में

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आजकल नयनों में

By |2018-10-23T23:26:55+00:00October 23rd, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

आजकल नयनों में आंसू आ गए
बीते हुए लम्हों की याद आ गए

मन आज फिर से गुमनाम हो गए
अब इन नयनों में नींद कैसे होगें

मेरे ख़्वाब ही मेरे नींद के खिलाफ
और मेरी किस्मत ही समाप्त हो गए

उनके करीब रह के मेरे सारे सितारे
बुलंदियों को छुआ मैंने अब तन्हाई

प्रेम के ज्वर में तपता यह माटी का
शरीर अब ये ताजी हवाएं क्या करें

बड़ी दुश्मनी सी हो गई है शायद
समय के साथ समय से अब शिकायत?
– प्रेम प्रकाश
पीएचडी शोधार्थी
रांची विश्वविद्यालय
रांची, झारखंड, भारत।

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प्रेम प्रकाश पीएचडी शोधार्थी (राँची विश्वविद्यालय) झारखण्ड, भारत।

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