स्वप्निल २२ साल का युवा जिसके काँधे पर ज़िम्मेदारी इतनी अधिक कि वह समझ नहीं पा रहा था कि उसके भी कुछ ख़्वाब हैं। बचपन से लेकर आज़ तक माँ का स्नेह ज़्यादा प्राप्त हुआ था पिता का स्नेह तो नाम मात्र का ही रहा था। इसीलिये वह काफ़ी गंभीर प्रवृति का दिखने लगा था।

पिताजी बहुत ग़ुस्से वाले थे जिस कारण से कभी नौकरी और बिज़नेस में टिककर नहीं रह पाये। माँ ने ट्यूशन पढ़ाकर बच्चों को क़ाबिल बनाया। नौकरी लगते ही सबसे पहले उसने माँ को आराम करने के लिये बोला। परंतु समय बहुत बलवान होता है! कौन जानता है कि अगले पल क्या होगा?

आज़ तो हद ही हो गई उसका बचाखुचा बचपन भी समाप्त हो गया। माँ का फ़ोन आता है “बेटा जल्दी आ पापा को अटैक आ गया है।” कहते–कहते रोने लगती हैं। उसके सामने एक पल के लिये अंधेरा छा जाता है और उसको लगता है कि प्रत्यंचा जो उसने चढ़ानी शुरू करी थी वह टूट कर बिखर गई है क्योंकि अपने बड़ों का साथ ही काफ़ी हौंसला देता है।

दो क़दम पीछे लौटता हुआ महसूस किया अपनेआप को पर उसने समय के आगे हार माननी सीखी नहीं थी। दुबारा से ज़िंदगी में नई प्रत्यंचा चढ़ा दी और ज़िंदगी नये सिरे से मज़बूती से शुरू की। माँ, बहन को संभाला और आगे बढ़ गया।

मौलिक रचना
– नूतन गर्ग (दिल्ली)

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