नाराज़गी महबूब की

नाराज़गी महबूब की

हर एक दस्तक पे पलक झपकती है,
दिल की धड़कन कुछ इस तरह धड़कती है|
दीदारे मुहब्बत की गुजारिश है उनसे,
पता नहीं वो क्यों नाराज़ हैं मुझसे|
दिल जख्मी था अब नासूर बन गया मेरा,
इतना तो बता दे क्या कसूर था मेरा|
नाराज़गी तभी जायज हुआ करती है
जब किसी कारणवश हुआ करती है|
कुछ खता हुई है तो बता दो मुझको,
नाराज़गी का राज बता दो मुझको|

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Rahi Mastana

Part time writer/Author/Poet

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