हादसों से भरे इस जहान में,
जिंदगी जिन हालातों से गुज़रती है|

हर सु बेचैनी, तड़प और कई फिक्रें,
कब दो घडी सुकून से बैठती है|

क्या, कब, कैसे, क्यों, किसलिए?
ज़हन में सवालों की झड़ी रहती है|

पैरों तले ज़मीं नहीं, आसमा है दूर,
सहारा न मिले खुदा का तो रोती है|

एक हसीं खवाब जो हो गया बेवफा,
याद में जिसके मेरी रूह तड़पती है|

जिंदगी है बेमुरव्वत, और बेवजह,
लाश की तरह अनु इसे क्यों ढोती है?

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