आपसे दूर आज रहना पड़ा हमें दुनियां ने आजमाया
सदियों बाद खुद से ज्ञान हुआ मन आज अशांत हुआ

तकलीफ बहुत हुआ उन्हें शायद मेरी अर्थी पर रोना
पड़ा उसे अब जाके उन्हें हम पे विश्वाश हो गया हमपे

उंडर ही अंदर जलाते रहे वें अंगारे और करने लगे
दिल के दरवाजे बंद हो सकता है कि वें ज़िन्दगी हो

लम्हा-लम्हा मैंने बिताया उनके एक-एक क्षण कैसे कहें
जिंदा कैसे उनके बेगैर मैं इस जहां में जीते जा रहे हैं

मैं शायद मैं डूबता हुआ सूरज हूं इश्लिये हमसे दरकिनार
आज हमसे मुझे इल्म हुआ नदी की तरह बनाना चाहिए

समझता हूं सब अर्थ का अनर्थ निकालते है इस संसार में
कैसे लिखे ये खुदा हमसब तेरे ही बंदे है इस भूखड़ पर

सारी ज़िंदगी मैंने मोतियों से पिरोया है तेरे नाम की ये नादान है ‘प्रेम’ जो तूने इतनी मोहब्ब्त करने की समर्थ

– प्रेम प्रकाश
पीएचडी शोधार्थी
रांची विश्वविद्यालय
रांची, झारखंड, भारत।

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