सर्दी गरीबों की

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सर्दी गरीबों की

By |2018-10-27T11:35:53+00:00October 27th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

एक सर्दी की रोज मैं सड़क पर टहल रहा था,
गर्मी की आस लिए हाथों को हाथों से मसल रहा था|
तभी मैंने कुछ ऐसा देखा, अर्धवस्त्रों में नर को देखा,
काँप रहा था ठिठुर ठिठुर, नेत्र पड़ गए थे स्थिर|
शायद अपनेआप मैं बोल रहा था,
टहनी और पत्तों को टटोल रहा था|
उस जलती बुझती आग में हाथों को सेंकें जा रहा था,
गीले पत्तों को सुखा के अग्नि में फेंके जा रहा था|
एक तपिश की ख़्वाइश तो उसको,
ठण्ड से लड़ने की आजमाइश थी उसको|
तभी कुछ सज्जन आ टपके, दिए जोर के उसको धक्के|
खाल खींच लेंगे बदन की, दे डाली फिर उसको धमकी|
जी बाबूजी कहते हुए वो बेचारा चल पड़ा,
मंद मंद मुस्कुराते हुए किस्मत पर फिर हँस पड़ा|
घूम रहा हूँ दर बदर ये मेरे नसीबों का सितम है,
मानवता और इंसानियत का पाला हुआ एक भ्रम है|

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