नज्म

कभी आसमा को जमीं पर उतारो
के दहशत भरी ज़िन्दगी को संवारों |

महका चमन फूल खिलने लगे है
कभी मेरी नजरों में आओ नजारो||

शहादत हमारी सदा याद रखना
हलाते-ए वतन को पतन से उबारो|

हमे भूल जाओ कोई गम नही पर
वतन आन है भूल जाओ न प्यारों||

शहर है विराना आदमी गमजदा है
कभी गुल का दामन गुलिस्ताँ निखारों!

के मतिहीन कहा सच जमाने जो तुमसे
कभी शीशे के घर पर पत्थर न मारो||

मनोज उपाध्याय मतिहीन
कभी आसमा को जमीं पर उतारो
के दहशत भरी ज़िन्दगी को संवारों|

महका चमन फूल खिलने लगे है
कभी मेरी नजरों में आओ नजारो||

शहादत हमारी सदा याद रखना
हलाते-ए वतन को पतन से उबारो|

हमे भूल जाओ कोई गम नही पर
वतन आन है भूल जाओ न प्यारों||

शहर है विराना आदमी गमजदा है
कभी गुल का दामन गुलिस्ताँ निखारों!

के मतिहीन कहा सच जमाने जो तुमसे
कभी शीशे के घर पर पत्थर न मारो||

– मनोज उपाध्याय मतिहीन

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