प्यार की हार

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प्यार की हार

By |2018-10-27T09:54:15+00:00October 27th, 2018|Categories: कहानी|Tags: , , |0 Comments

55 वर्षीय चित्तरंजन बाबू एक निजी कंपनी में लिपिक थे। पत्नी दो वर्ष पहले ही अलविदा कह चुकी थी। एक बेटा था-निखिल। विलायत में इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा था।

जीवन का दो-तिहाई गुजार चुके चित्तरंजन बाबू बहुत ही ईमानदार,कर्मठ,सत्य-प्रेमी और इज्जतदार व्यक्ति थे। आस-पड़ोस के लोगों से लेकर ऑफिस के मैनेज़र तक उन्हे अभिभावक की तरह सम्मान देते थे और कोई भी काम करने से पहले सलाह लेते थे। आजकल घर में अकेले दिन और रातें काट रहे पिता का अब तो एक ही सपना था-बेटे की पढ़ाई पूरी हो,उसकी शादी करें और अपने मकान में एक बार फिर हंसते-खेलते घर को देखें।

शाम का वक्त था। घड़ी की सुई सात बजा रही थी। दैनिक दिनचर्या के हिसाब से निखिल के पिता ऑफिस से आने के बाद चाय की चुस्की लेते हुए टीवी पर समाचार देख रहे थे। तभी मोबाइल फोन की घंटी बजी। जान से प्यारे पुत्र का फ़ोन था। पिता का हृदय गदगद हो उठा। फ़ोन पर बातचीत करने के बाद रसोई में खाना पका रही रेणु से चिल्लाकर बोले-“निखिल के फाइनल सेमेस्टर का रिजल्ट आ गया है। मेरा बेटा दो दिन बाद आ रहा है, इंजीनियर साहब बनकर। उसके आने पर खाने में पनीर की सब्ज़ी बना देना और कुछ मीठा भी। ”

रेणु घर का कामकाज करने के लिए नौकरानी रखी गई थी। आखिर बूढ़ा शरीर अकेले खाना-पीना,घर की साफ-सफाई कैसे करता। खैर,वो दिन भी आ गया जब इंजीनियर साहब चार साल बाद अपने पैतृक घर में बुज़ुर्ग पिता के साथ खाने पर बैठे हुए थे। निखिल ने खाने के मेज़ पर बैठने के पहले से चल रहे बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए कहा-“तीन कंपनियों में इंटरव्यू भी दिया है। बस पापा,अब तो कॉल आने का इंतज़ार है। तबतक सोचा कुछ दिन की छुट्टी है,आपके साथ गुज़ार लूँ। ”
खुशमिजाज पिता ने पनीर से पूरी का एक टुकड़ा मुँह में डालने के बाद कहा-“हाँ, बस तुझे नौकरी मिल जाए,फिर एक अच्छी-सी लड़की देखकर तेरी शादी कर दूं और फिर ईश्वर की सेवा में लग जाऊं। ”
खुशहाली का रंग उत्तरते हुए चेहरे के साथ छोटा-सा जवाब मिला-“हूं” और खाने की गति बढ़ गई। सब्ज़ी और विशेष रूप से बनवाई गई खीर के साथ परोसी गई पुरियों को जल्दी-जल्दी निपटा कर इंजीनियर साहब अपने कमरे में चले गए। पिता अभी खा ही रहे थे। यह पिता के संस्कारों के विरुद्ध था। लेकिन उन्हें बात कुछ समझ नहीं आई,इसलिए जाने दिया।

कुछ दिनों बाद निखिल को एक कंपनी से कॉल आ गया। नौकरी मिली,खुशी में मिठाइयां बटीं। लेकिन साथ-ही-साथ निखिल की खुशियां चिंता में भी बदल गईं। पिता ने उसे बताया कि उनके पुराने मित्र जयंती प्रसाद अपनी बेटी का रिश्ता निखिल से करना चाहते हैं और उससे मिलने के लिए आ रहे हैं। वो पिता से कुछ कह पा रहा था और ना ही उनके निर्णयों से खुश दिख रहा था।

जयंती बाबू के आने का वक्त हो गया था । ऐसे तो पहले भी कई बार आ चुके थे। पर इस बार अपने मित्र को समधी बनाने का प्रस्ताव लेकर आ रहे थे। इसलिए रेणु और चित्तरंजन बाबू स्वागत की विशेष तैयारिया कर रहे थे। परंतु, निखिल के चेहरे पर चिंता की गहरी घटा छाई हुई थी। पुराने मित्र रिश्ता लेकर आए, स्वागत-सत्कार नाश्ता-पानी हुआ। निखिल से लंबी बातचीत हुई। पूरी जानकारी ली गई और
शादी की बात आगे बढाने की बात कह कर विदाई ली गई। चित्तरंजन बाबू ने तो वादा भी कर दिया कि नौकरी जॉइन करने के बाद पहली बार जब भी निखिल आएगा,शादी का शुभ मुहूर्त निकलवाकर मित्रता को जल्द-से-जल्द रिश्ते में बदला जाएगा।

निखिल विलायत जाने से पहले अपने बचपन के मित्र पवन से मिला और उसे अपनी सारी समस्या बताई। इंजिनीरिंग कॉलेज की प्रेरणा, जिससे वो शादी करने का वादा करके आया है, से लेकर पिता द्वारा जयंती बाबू की बेटी के साथ रिश्ता ठीक करने के बात तक। यौवन के जोश में मदहोश स्नातक की पढ़ाई के दौरान ही प्रेम विवाह कर चुके पवन ने निखिल को अपने हिसाब से उचित सलाह देते हुए हिम्मत करके पिता को सबकुछ बता देने की बात कही। साथ-ही-साथ यह भी कहा कि चाहे कुछ भी हो जाए प्यार की हार ना होने पाए।

घर से निकलने के वक्त पिता से अपने मन की बात बताने की हिम्मत कर,निखिल पिता के कमरे में तो गया। पर,आमना-सामना होते ही सारी हिम्मत खोकर आशीर्वाद लेकर रवाना हो गया।
पिता और जयंती बाबू कभी-कभी मुलाकात होने पर शादी की योजनाएं बनाते थे। बस,इंतजार था तो निखिल के छुट्टी पर वापस आने का।
लगभग दो महीने बाद,ऑफिस से आकर चित्तरंजन बाबू सोफे पर बैठे हुए थे। पर,मन कुछ अटपटी सी बात का एहसास दिलाना चाह रहा था। इसलिए टीवी देखने की इच्छा नहीं हो रही थी। आलमारी में से एल्बम निकाला और पुरानी तस्वीरे देखकर यादें ताज़ा करने लगे। बेटे की तस्वीर देखकर सोच में डूब गए कि-नन्हा-सा था। आज इंजीनियर बन गया है और शादी की बातें चल रही है। आज अगर उसकी माँ होती तो सब मिलकर खुशियां मनाते। तभी मोबाइल की घंटी बजी और ख्यालों से मश्तिष्क बाहर आया। साहब का फ़ोन था,इंजीनियर साहब का। प्रफुल्लिति मन और बेटे के छुट्टी में आने के उम्मीद के साथ फ़ोन उठाने पर बहुत ही कड़ी आवाज़ सुनाई पड़ी। आवाज़ तो निखिल की ही थी। पर,बदली-बदली सी-“मैंने अपने पसंद की लड़की से शादी कर ली है। अगर आपको कोई ऐतराज़ ना हो तो फ़ोन करके बता देना। मैं पत्नी के साथ ही इसबार घर आऊंगा वरना नहीं आऊंगा।”
फ़ोन कट गया और चित्तरंजन बाबू के योजनाओं के धागों को व काट गया। सबसे पहले तो जयंती लाल से किए गए वादे की याद आई। आंखों से निरंतर अश्रुधारा बहने लगी। एक हारा हुआ पिता सोफे पर ही लेट गया। रेणु खाना बनाकर मेज़ पर रखकर घर को चली गई।
सुबह को आई तो दृश्य वही था,लेकिन कुछ ज्यादा ही अलग था। खाना मेज़ पर ही पड़ा था और सदमे में डूबे पिता सोफे पर लेटे हुए ही इस संसार के समस्त जिम्मेदारियों से मुक्त हो चुके थे। उधर निखिल ने पवन को फ़ोन कर बताया कि प्यार कभी नहीं हार सकता। उसने भी अपने प्यार को दुनिया से जीता दिया।
रेणु द्वारा पिता के फ़ोन से ही फ़ोन करने पर निखिल ने समझा कि पिता ने बहु के साथ घर बुलाने के लिए फोन किया
है। यह सोचकर गदगद हो गया कि प्यार की असली जीत अब हुई। लेकिन खबर सुनते ही वो बेहोश-सा जमीन पर ही बैठ गया।
उम्मीद है कि अब तो इंजीनियर साहब के गणित ने उन्हें यह समझा दिया होगा कि 24 साल से चल रहे पिता-पुत्र के प्यार के आगे 2-3 साल से चल रहा प्यार बहुत ही छोटा है। इसलिए निष्कर्ष यह है कि-प्यार हार गया।

– सन्नी कुमार सिन्हा

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About the Author:

निवास-छपरा(सारण),बिहार। गणित विषय से सबंध होने के साथ-साथ हिंदी लेखन में अत्यंत रुचि।काव्य एवं कहानी के साथ-साथ आलेख भी लिखते हैं। अपने लेखन के माध्यम से समाज के बुराईयों, अच्छाइयों एवं ज़रुरतों को उजागर करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। फ़ोन-8651315608

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