सफर

वनिता को सालों पहले के दिन याद आ गए… कितना समय बदल गया। एक बच्ची से बुढ़ापे की दहलीज पर पहुँच गई थी वह…. वो कितने सुहावने दिन हुआ करते थे, कॉलेज जाना मस्ती भरे दिन बस सपनों में खोये रहना।

जब चाहे पिक्चर देखने चले जाना उस समय मनोरंजन का साधन सिर्फ पिक्चर हुआ करता था।

लड़कियों के लिए उस समय कहा जाता था कि बस उतना ही पढ़ ले जितना जरूरी है। कभी जिंदगी में मुश्किल आ जाये, कम से कम अपना घर तो चला सक। हर लड़की भी जानती थी कि उसे तब तक ही पढ़ाया जा रहा है जब तक शादी नहीं हो जाती…

उनके न तो कोई बड़े सपने होते थे न ही बड़ी इच्छाएं, जानती थी शादी के बाद चूल्हा चौका ही करना है एक ऐसा लड़का मिल जाए जो सारी जिंदगी भरण-पोषण कर सके ।

वनिता की भी एम ए करते ही शादी हो गयी थी, शादी भी यूपी के एक छोटे से शहर में, और उस परिवार में जहाँ पढ़ी लिखी बहुएं ही नहीं थीं, न हीं परिवार के और सदस्य इतने पढ़े-लिखे थे। परिवार भी उस समय बड़े हुआ करते थे। शादी के बाद अक्सर सोचा करती थी कि क्या लड़कियों की यही जिंदगी होती हैं। केवल खाना बनाने तक सीमित है…

कमरे से रसोई और रसोई से कमरा लम्बा सा घूंघट करो। मार्केट भी आप बिना घूंघट के नहीं निकल सकती थी। देवर से भी घूंघट करने को कहा गया। यहां वनिता विद्रोही हों गयी बोली घूंघट करके बाहर नहीं निकलूंगी आखिर बात मान ली गयी और थोड़ी छूट मिल ही गई। फिर वनिता के पति को दिल्ली में नौकरी मिल गयी वह भी दिल्ली आ गई।

यहाँ आने के बाद में वह पहली बार घर से इतनी दूर हुई। एक नयी जिंदगी के लिए… इस तरह परिवार से निकल कर अकेले रहना आसान नहीं था। हमेशा बड़ों की छत्रछाया में रही वनिता एक अच्छे एवं धनाढ्य परिवार की लड़की थी।

उस समय दिल्ली में काम वाली मिलना आसान नहीं था। कभी काम किया भी नहीं था। थोड़ी बहुत मुश्किल हुई, कपड़े कभी धोए ही नहीं थे। वनिता ने सोचा क्या करें? खासकर चादर धोना तो बहुत ही मुश्किल काम था। क्या किया जाए लेकिन वनिता को साफ-सुथरे रहने की आदत थी।

वनिता जिसके घर में रहती थी, उनसे पूछा कि दीदी यहां कोई काम-वाली मिल सकती है क्या? जो चादरें आकर धो जाये। आखिर एक काम-वाली बुला ली। उससे कपड़े धुलवा लिए, फिर मकान मालकिन मुस्कुराने लगी, तुम्हें काम करना नहीं आता…. चलो हम सिखाते हैं। उन्होंने ही वनिता को कपड़े धोना सिखाया दिया। वनिता ने सोचा कितना आसान था, हम तो वैसे ही घबरा रहे थे।

बस बच्चों को पढ़ाना लिखाना यही चिंता रहती थी। वनिता सोचती कि यदि बच्चे अगर कुछ बन जायें, तो घर से निकलना सफल हो जायेगा। हुआ भी यही बच्चे बड़े हुए अच्छी नौकरियाँ लग गयी।

अब वनिता को खाली समय मिलने लगा सब अपने में व्यस्त थे। पति भी नौकरी से रिटायर होने के बाद, एक छोटा सा कारोबार करने लगे। रह गई बस वनिता…. वो भी अकेली, तभी एक दिन पड़ोस में भजन-कीर्तन था। वह वहां चली गई एक-दो भजन भी गाये।

वहीं पर एक राजनैतिक पार्टी की अध्यक्षा बैठी हुई थी। उनसे बात होने लगी उन्होंने वनिता से पूछा- ‘आजकल क्या करती रहती हो?’ वनिता बोली- ‘कुछ नहीं बस समय निकल रहा है, कभी-कभी तो बहुत उदास हो जाती हूँ। कभी खाली नहीं रही…. मन ही नहीं लगता… क्या करूँ?’ तभी अध्यक्षा- ‘बोली काम तो बहुत हैं, करना चाहो तो…. आपके अंदर टैलेंट है तो अब उसे निखारिये..’.

इतना काम करो कि बिस्तर पर लेटते ही नींद आ जाये। फिर देखिए समय कहाँ निकलता है? पता ही नहीं चलेगा। वनिता को उनकी बात बहुत अच्छी लगी। वह उसी दिन से लग गई समाज सेवा में….

आज बड़ा सुकून मिलता है। अब ज़रूरतमंद की सेवा करना उसको बहुत अच्छा लगने लगा। वह सोचे जा रही थी, तभी कानों में आवाज सुनाई दी, बहन जी! चलना नहींं है? आज अनाथ आश्रम चलना है।

नीरजा शर्मा “नीर”

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