जंग है ये जिंदगी, तंग है ये जिंदगी|
बिना प्रेम के गुलशन के, बेरंग है वे जिंदगी|

है भरा तनाव से, जीना इसे है दाव से|
धोखे, जाल-फरेब से, प्रचंड है ये जिंदगी|
जंग है ये जिंदगी, तंग है ये जिंदगी|

है तबाह इंसानियत, हैवानियत के संग है एक कारवां|
झुक रहा पलड़ा यहां सच्चाई का, देख हालत इस जहाँ का दंग है ये जिंदगी| जंग है ये जिंदगी, तंग है ये जिंदगी|

है बोलबाला पाप का, पुण्य का है मिट
रहा नामो-निशां|है दिख रहा अपराध,
चरम छूता हुआ| अति का अंत
का होगा, इसी उम्मीद में प्रसन्न है ये
जिंदगी| जंग है ये जिंदगी, तंग है ये
जिंदगी|

आएंगे मसीहा, करने तांडव यहाँ| करेंगे अंत पापियों का,खिलेंगे फूल चमन में प्यार का| ये मत भूलो! परमात्मा का अंग है ये जिंदगी| जंग है ये जिंदगी, तंग है ये जिंदगी|

– चंदन कुमार
आत्मज वेद प्रकाश शर्मा,छोटी कोपा,
नौबतपुर,पटना(बिहार)

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