पैसा तुम जगतरण हो, मैं रोज तुम्हे पाने की कोशिश करता हूं–२
सुनो हे रूपया और पैसा, मैं सिर्फ तेरा राह देखता हूं–२

मैं धन से फतेहार हूं मैं विनती करूं बार-बार।
लेकर सर पर बालू की गठरी धोता हूं तेरी खतिर।
रूपया तुम

तुझें पाने के लिए अक्सर दिमाग खर्च करते रहता हूं।
पैसा तुम मेरे साथ कभी मत छोड़ना ए रूपया।
पैसा तुम

रूपया आशा करता हूं अपनी पनाहों में ले लो।
पैसा करो हमपे कृप्या अपनी रहमत बरसा दो।
रूपया तुम

– प्रेम प्रकाश
पीएचडी शोधार्थी
रांची विश्वविद्यालय
रांची, झारखंड, भारत।

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