बचपन का प्यार

बचपन का प्यार

आओ चलो तुम्हें एक बात बताता हूँ,
कुछ गुज़री कुछ आपबीती सुनाता हूँ|
एक छोटी सी कहानी की,
छायी हुई नयी जवानी की|

कक्षा दस में पढ़ा करते थे,
फैशन मैं उड़ा करते थे|
एक लड़की से ऑंखें चार हो गयी थी ,
उमंगें ह्रदय में गुलज़ार हो गयी थी|

अजब से फ़साने बनने लगे थे,
अपना बनाने के सपने जगने लगे थे|
उसको पटाने के तरीके सोचते थे,
अपनेआप में एक हीरो खोजते थे|

घर से निकलने से घर वापिस जाने तक की खबर रहा करती थी,
उनकी हरेक गतिविधियों पे इस आशिक़ की नजर रहा करती थी|
अपना प्यार बड़ा ही सच्चा था,
फिफ्टी फिफ्टी तो जैसे पक्का ही था|

टकटकी लगाए उनको देखा करते थे,
उनकी हरएक अदा पे मरा करते थे|
इस दौर को कुछ महीनों तक चलाये रखा,
इज़हारे मोहब्बत सीने में दबाये रखा|

फिर एक रोज़ इश्क़ का इज़हार कर डाला,
उन्हें एक प्रेमपत्र प्रस्तुत कर डाला|
दिल इंतज़ार करने लगा, बेहिसाब सा धड़कने लगा,
क्या फिफ्टी फिफ्टी वाला हंड्रेड (100) मैं बदल पायेगा?
आएगा बड़ा सुकून जब हमसफ़र मिल जायेगा|

पर शर्माए वो इतना कि अनदेखा करते रहे,
और हम संदेशे पे संदेशा भेजते रहे|
कभी तो ये बेरुखी चाहत मैं भी बदलेगी,
देख के इस परवाने को वो शमा भी पिघलेगी|

पीछा करने का दस्तूर यूँ कायम रखा,
सब्र पे अपने बनाये यूँ संयम रखा|
तभी एक दिन उनके भाई ने हमको देख लिया,
खुदा की कसम बेरहमी से हमको सेंक दिया|

पर हम भी आशिक़ बन के पिटते रहे,
और अंतरात्मा से उनकी उफ़ सुनते रहे|
दिल को चैन आया कि चलो उनको अफ़सोस तो हुआ,
हमारी पिटाई का दर्द महसूस तो हुआ|

कुछ दिनों तक सावधानी यूँ बरती गयी,
तभी अचानक एक और आशिक़ की भर्ती हुई|
क़िस्मत ने पटक दिया एक बड़े से अज़ीब मोड़ पर,
वो लटक के चल दिए बाइक पे मुझे अकेला छोड़ कर|

दिल टूट गया आँखें भी कुछ इस तरह भर आयी,
तभी दूर एक और महजबीन नज़र आयी|
दिल में उमंगें फिर से जवान होने लगी,
प्यार कि तरंगे नए रूप में बयां होने लगी|

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Rahi Mastana

Part time writer/Author/Poet

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