हाल न पूछो ए मुसाफिर!
हाल न पूछो ए मुसाफिर!

मुसाफिर कत्ल-ए-आम
तो सरेआम हो गय है हमारे!

अपना व्यथा क्या सुनाएं हम
तुम्हें तुम तो हर रोज मेरी
हर एक अंग को तहस नहस
करते हों आज जड़ से अलग
कर ही दोगे तो मैं मर जाऊंगा!

हाल न पूछो ए मुसाफिर!
हाल न पूछो ए मुसाफिर!

मैं खामोश हो जाता हूं
मेरी ज़िंदगी से तुम हतास हो गए हो न!

चलो मैं अंतिम विदा लेती हूं
मेरे रोम-रोम में ऑक्सीजन
बसा हुआ है मैं तुम्हरा जीवन हूं
मुझे मत मारों, मुझे बचा लो!!

हाल न पूछो ए मुसाफिर!
हाल न पूछो के मुसाफिर!

– प्रेम प्रकाश
पीएचडी
शोधार्थी
रांची विश्वविद्यालय
रांची झारखंड भारत।
12/11/2018

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