ऐसा क्यों?

Home » ऐसा क्यों?

ऐसा क्यों?

By |2018-11-12T18:00:39+00:00November 12th, 2018|Categories: कहानी|Tags: , , |0 Comments

वन्दना को बहुत दिनों से नहीं देखा तो लगा शायद उसकी शादी हो गयी होगी। अचानक ही व्हाट्सएप पर उसका नाम दिखा
तो गरिमा से न रहा गया उसने मैसेज भेज ही
दिया -”अरे वन्दना तू कैसी है ?कहाँ है ?”
कुछ समय बाद वन्दना का फोन ही आ गया,”नमस्ते मैम आप कैसे हो ?”
“ठीक हूँ, तुम बहुत दिनों से नहीं आयी तो सोचा
फोन ही कर लूँ।”
“हाँ मैम, मैने बताया था ना कि मैने अपना घर ले लिया है।”
“हाँ हाँ बताया तो था, कहाँ पर मकान लिया है?”
वन्दना से बातें करते करते गरिमा काफी पीछे चली गयी। वन्दना गरिमा की छात्रा थी, एक सुन्दर सी छोटी सी बच्ची जो पढ़ने में भी काफी होशियार थी। तब वह पाँचवीं में थी और तभी गरिमा की नौकरी भी लगी थी। सभी बच्चों में वन्दना अलग नजर आती थी। वह कोई भी काम हो सबसे आगे रहती थी चाहे खेलकूद हो, चाहे पढ़ाई सभी में अव्वल रहती थी। पर उसके चेहरे पर एक मायूसी सी झलकती थी। बहुत पूछने पर पता चला की उसके पिता शराबी हैं और शराब पीकर घर में हमेशा कलह करते हैं। वन्दना चार बहनों में सबसे बड़ी थी। उसके कोई भाई नहीं था इस कारण भी घर में कलह होती रहती थी। गरिमा उसे हमेशा ही घर की बातों पर ध्यान न देने तथा मन लगाकर अपनी पढ़ाई करने की सलाह देती। गरिमा के इसी लगाव के कारण वन्दना उससे हर बात बताती थी।
पाँचवीं करने के बाद वन्दना बड़ी कक्षा में पढ़ने के लिए सीनियर सेकेंडरी स्कूल में चली गयी। कभी कभी रास्ते में मिलती तो नमस्कार जरूर करती और गरिमा भी उसकी
पढ़ाई के बारे में जानकारी लेती रहती थी। एक
दिन वन्दना ने गरिमा से उनके घर का पता ही
माँग लिया। गरिमा ने बिना किसी हिचकिचाहट
के उसे अपने घर का पता दे दिया। अब वह
जब भी छुट्टी मिलती गरिमा के पास आ जाती
थी।
बीच में करीब पाँच छह साल वन्दना जब अपनी शिक्षिका गरिमा के घर नहीं आयी तो उन्हें लगा की शायद उसकी शादी हो गयी होगी। परन्तु एक दिन फिर वन्दना अपनी शिक्षिका के आगे खड़ी थी।
“नमस्ते मैम।”
“अरे वन्दना तू, तू इतनी बड़ी हो गयी ? मुझसे भी लम्बी हो गयी।”गरिमा के चेहरे पर
खुशी के भाव तिर रहे थे। वह इस कदर खुश
हो रही थी मानों उसकी बेटी ही सामने खड़ी हो।
“आ जा, अन्दर आ जा। कहाँ थी ? क्या कर रही हो इस समय? कई सवाल उन्होंने वन्दना
से कर डाले।
“मैम मै नौकरी करती हूँ। घर के खर्च के लिए बी.ए. के बाद ही प्राइवेट कम्पनी में काम
करने लगी। क्या करती पापा का अभी भी वही
हाल है। छोटी वाली भी अपनी पढ़ाई के साथ साथ ट्युशन भी पढ़ाती है।” उसकी आँखें डबडबा गयीं थी।
“अच्छा बैठ मैं चाय लाती हूँ।”
“नहीं मैम, मैं बनाऊँगी चाय आप बैठिए।”
थोड़ी ही देर में वह चाय बना लायी। चाय
पीते हुए वन्दना ने कहा,”मैने तो सोचा था की
तेरी शादी हो गयी तभी तू इतने दिन से नहीं आयी।”
“हाँ मैम शादी भी हो गयी थी और छूट भी गयी।”
“मतलब ?”
“मतलब डिवोर्स हो गया।”
“क्यों क्या हुआ था।”
“मैम बिना दहेज की शादी पाकर मम्मी पापा ने बिना कुछ पता किये मेरी शादी कर दी। शादी
के बाद पता चला की वह तो विछिप्त है।”
“फिर क्या हुआ ?”
“मैम क्या होना था, दूसरे दिन पगफेरे में घर आयी तो वापस ही नहीं गयी। मैं क्यों उसके साथ जीवन गुजारूँ?”
“फिर ?”
“फिर क्या मैने उसे सीधे डिवोर्स दे दिया। गलती उन लोगों की थी अतः म्युचुअल डिवोर्स मिल गया दो महीने के भीतर ही।”वन्दना की
आँखों में खुशी और जीत की चमक नजर आ
रही थी।
“अच्छा किया ?” मुझे वह अधिक समझदार
लगने लगी थी जो जीवनभर पिसने के बजाय
एक झटके से निर्णय लेना जानती है।
“अब क्या कर रही हो ?” मैने उसे पानी देते हुए
पूछा।
“सर्विस कर रही हूँ मैम, एक अच्छी कम्पनी में
काम मिल गया है।”उसने पानी का गिलास मेज पर रखते हुए बड़े इत्मिनान से कहा। उसके चेहरे पर एक अपूर्व शान्ति थी।
अब तो छोटीवाली बहन की शादी हो जाये फिर एक अच्छा सा मकान ले लेंगे
और तुम, तुम शादी नहीं करोगी ?
“क्या करूँ मैम समझ में ही नहीं आता। शादी के नाम से ही दिल दुखी हो जाता है।” वह बोले जा रही थी और आँखें नम हुई जा रही थीं। वह भरसक उसे छिपाने का प्रयास कर रही थी।
“मैम मैं आपके लिए चाय बनाती हूँ।”वह उठकर रसोई की ओर जाने लगी।
कुछ महीनों बाद उसने गरिमा के व्हाट्सएप्प पर अपनी बहन की शादी की पिक भेजी तो उन्होंने बधाई के साथ साथ उसे अपने बारे में
भी सोचने के लिए कह ही दिया।
धीरे धीरे तीन साल गुजर गये। गरिमा को
भी लगा की शायद वन्दना की भी शादी हो गयी
होगी क्योंकि बीच में उनके पास वन्दना का कोई भी फोन या मैसेज नहीं आया तो उन्हें लगा की बच्ची है और उनकी छात्रा है कोई बात
नहीं अगर उसने नहीं बताया। वह उनकी सहेली थोड़े ही है की हर बात बतायेगी ही। सहेलियां भी तो कई चीजें छिपा लेती है। उन्होंने स्वयं ही स्वयं को दिलासा दे डाला।
कुछ दो तीन साल बाद एक दिन व्हाट्सएप
देखते हुए अचानक गरिमा की नजर व्हाट्सएप में वन्दना के नाम पर पड़ी। उन्होंने ऐसे ही मैसेज लिख दिया,
“क्या कर रही है ?”
कोई दो घंटे बाद वन्दना का जवाब आ गया,”मैम शाम को आपसे बात करूँगी।”
शाम को वन्दना का फोन आया तो गरिमा को बहुत ही खुशी हुई मानों अपनी ही बेटी मिल गयी हो।
“ हाँ वन्दना, कहाँ चली गयी थी ?”उनकी आवाज़ में एक शिकायत का पुट भी झलक रहा था।
“कहीं नहीं मैम, मैने अपना घर ले लिया है मैं अब यहाँ नहीं रहती।”
“अच्छी बात है अपना घर ले लिया, अब अपने
बारे में भी सोचो।”
“हाँ मैम मैं वही सोच रही हूँ।”
“और मम्मी-पापा, भाई-बहन सब ठीक हैं ?”
“हाँ ठीक ही होंगे, पता नहीं वे लोग मुझे फोन नहीं करते।”
क्या मतलब ?
“हाँ मैम मैं अब अकेली रहती हूँ। मेरे आसपास
के अंकल आंटी सब बहुत अच्छे है। मुझे अकेलापन नहीं महसूस होता।”
“ऐसा क्यो ?”
“ मैम मैं क्या करती ? मैं तो नौकरी करके सारा पैसा उन्हीं लोगों पर लगा रही थी। बहन
की शादी में भी काफी पैसा खर्च किया। लेकिन पिताजी का व्यवहार सही नहीं था। वे रोज ही
घर में चार पाँच लोगों को लेकर आ जाते और
फिर देर रात तक शराब पीते और पिलाते थे।
इसी बात पर मेरी कई बार लड़ाई भी हुई। पर वे
नहीं माने। आखिर मैने ही घर छोड़ने का फैसला कर लिया। मैम मैं केवल दो कपड़े लेकर चुपचाप घर से चली आयी।
फिर ?
फिर क्या, कुछ दिन अपनी सहेली के घर रही फिर यह मकान खरीद लिया। अब मैं चैन
से रह रही हूँ।
माँ बुलाने नहीं आयीं ?
“नहीं कोई पूछने तक नहीं आया की मैं कैसी हूँ
और कहाँ हूँ। उनको लगा की यह तो लड़की है, जायेगी कहाँ ? वापस लौटकर घर हीआयेगी। वो तो थोड़े थोड़े पैसे जोड़ रखे थे जो मकान खरीदने में काम आ गये और कुछ मैने लोन ले लिया।”
आखिर माँ-बाप इतने कठोर भी कैसे हो जाते हैं। अपने ही पिता गलत कैसे हो जाते है ? आखिर ऐसा क्यो ?

– डॉ.सरला सिंह

Say something
No votes yet.
Please wait...

About the Author:

शिक्षण कार्य टी.जी.टी.हिन्दी खाली समय में लेखन कार्य।

Leave A Comment