आया त्यौहार दीवाली का, पर्व प्रकाश खुशहाली का|
बुराई पर अच्छाई की जीत का, प्रेम सदभाव और प्रीत का|
जगमग हो रहा हर घर द्वार है, मिठाई, उपहार और पटाखों की भरमार है|
पर क्या जान पाए हम इस उत्सव को, इसकी मान्यताओं और महत्व को|
बाहर बाहर उजियारा है, पर अंतर्मन मैं अँधियारा है|
राजनीती व्यस्त है वोटों पर, तो कोई लड़ रहा नोटों पर|
कोई मांगता आरक्षण है, तो कोई छीन रहा कण कण है|
हर तरफ क्लेश मचे हैं, सदाचार के बस अबशेष बचे हैं|
माराकाटी हाहाकार है, हर तरफ भ्रष्टाचार है|
आगे बढ़ने की स्पर्धा में, हम छोड़ रहे हैं अपनों को|
भूल गए हम हर उपदेशों और मानवता के सपनों को|
चलो मार डालो इस रावण को, जलन द्वेष के कारण को|
बांटे सब दुखियों के गम, सब को लेकर साथ चलें हम|
हर चेहरे पर खुशहाली हो, ऐसी हमारी दीवाली हो|

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