अतिथि देवो भवः

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अतिथि देवो भवः

By |2018-11-16T00:07:26+00:00November 16th, 2018|Categories: व्यंग्य|Tags: , , |0 Comments

एक दिन श्रीमान मेहमान बिन बुलाये घर आ टपके,
और हम मियां बीबी मन ही मन बड़बड़ायें जी भर के|
एक दो दिन औपचारिकताओं में निबटाया गया,
तरह तरह के व्यजनों को उनको ठुसाया गया|
देकर उनको अपना बेड हम ज़मीन पे सोते रहे,
और वो निर्लज्ज हसीन से सपनों में खोते रहे|
शर्म हया में उनको कुछ कह नहीं पा रहे थे,
और वो साहब दिन पे दिन बढ़ाये जा रहे थे|
सारे जतन सारे प्रयास बेमानी से लगने लगे थे,
वो हमारे आवास को अपना ही समझने लगे थे|
फिर एक रोज उनकी श्रीमती से फ़ोन पे कुछ बातचीत हुई,
उनके चेहरे के हवाइयां कुछ उड़ती हुई सी प्रतीत हुई|
हमने पूछा क्या हुआ श्रीमान आप क्यों परेशान है, क्यों मुँह लटकाया है,
बुझे मन से बुदबुदाए और बोले मेरे घर भी एक मेहमान आया है|
अब मुझे आपसे विदा लेनी ही होगी,
आपके जैसी परीक्षा अब मुझे भी देनी होगी|
अतिथि देवो भवः बस एक दो रोज़ ही सहन होता है,
पर जब मेहमान ज्यादा टिक जाये तो मेजबानों का दहन होता है|

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