दिल से दिल…

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दिल से दिल…

जब कोई प्रेमी जोड़ा एक दुसरे को प्रसंद तो करता है पर दिल की बात सामने वाले से कह नहीं पता और अपने दिल की चाहत समझ नही पता उसका एक द्रश्य इन पंक्तियों के माध्यम से-

तेरी गलियों से गुजरे जो गाते तराने
तू हमको ही देखे खुद से नजरें चुराते
छेड़ूं जो तुमको मैं करके इशारे
थे तुम कितने मुझपे गुस्से दिखाते
जो दो पल को हो जाऊँ आँखों से ओझल
थे कितना वो पल तुमको. सताते
ललक आँखों की या हो बेचैनी दिल की
सरगम सी बिखरी. दिल. कि तानों को
इक तेरा मन जाने है औ मेरा मन जाने है।।

प्रेम में प्रेमी एक दूसरे की भावनाओं को
समझने लगते हैं और एक दूसरे के प्रति दिल में अपार प्रेम हिचकोले लेने लगता है तब एक द्रश्य चन्द्र पंक्तियों द्वारा पेश है:

तेरी आँखों से चाहत को समझता हूँ
इन होठों की मुस्काहट को तड़पता हूँ
तू बेचैन धरती सी जो तपती है
मैं अम्बर के बादल सा बरसता हूँ
तू लाख पहरे बिछा दे अपनी मोहब्बत की राहों में
उठे जो कसक, जोरों से
दिल तेरा धडकता है औ दिल मेरा धड़कता है।।

जब प्यार बहुत गहराई तक बस जाता है तो इसमें तकरार होती है और तकरार के बाद का प्यार ही अससासों से भरा होता है क्या होता है गौर करियेगा:

जो एक रोज मिले, लिपट हम रोये थे
बाँहों में सिमटे हम सपनों में खोये थे
तेरा यूँ गले से लगाना, दो दिलों का धडकना
वो दिल की धडकनों को सुनाना
बिन साज के बजती हैं जो शहनाईयाँ
इसकी छनक पे,
न तेरा जोर चलता है न मेरा जोर चलता है

अब वाकई सामने वाली की अहमियत ज़िन्दगी में क्या है बिछड़ने के अहसास से वाकिफ होकर जब मिलन होता है जैसा की प्रेम एक डोर और पतंग की तरह है जब तक पतंग डोर के साथ है वो उचाई को बढती ही और अपने को डोर से आलग करने की कोसिस करती है पर डोर से अलग होते ही पतंग और डोर दोनों का अस्तित्व पल भर में ख़त्म हो जाता है इक द्रश्य:

काश वो गुजरे पल मिल जाएँ जीने को
जो गुजरूँ तेरी गलियों से तू नजर आये
हमको ही देखे तू नजरें चुराते
एक पल को हो जायें हम जो आँखों से ओझल
हो बेचैनी दिल में हर पल को हमारे ख्यालों में
जो नज़र आ जाएँ हम दोनों खिल जाएँ
फिर से छेड़ूं जो तुमको मैं करके इशारे
दिखाओ तुम मुझपे मोहब्बत से भरा गुस्सा
औ खो जाएँ हम एक दूजे की मोहब्बत में
सुन के एक दूजे के अल्फाजों की सदा.
तेरा दिल मचल जाये औ मेरा दिल मचल जाये।।

प्रेम की सुरुआत और समर्पित प्रेम दोनों में ही उम्मीद होती है एक उम्मीद ही विस्वास का रूप होता है जिसका एक द्रश्य:

ख्वाहिश नहीं की मैं चाँद तारों में बसूं
तमन्ना है के मैं तेरा चाँद तारा ही बनूँ
ख़्वाबों में बसाया तुझको ऐसे, जैसे चाँद की चांदनी
के मेरे ख्वाबों को तेरी मुकम्मल जो गिरफ्त मिले
तमन्ना है सुने दिल, तेरे धडकनों कि सदा
सुन के जिन धडकनों की सदा.
तेरा दिल मचलता है
औ मेरा दिल मचलता है।।

– सुबोध उर्फ़ सुभाष

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