मोहब्बत कितनी अजीब है

Home » मोहब्बत कितनी अजीब है

मोहब्बत कितनी अजीब है

By |2018-11-17T11:16:31+00:00November 17th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

ये मोहब्बत, हाँ मोहब्बत ही, कितनी अजीब है
करता हर कोई है पर समझता है सिर्फ कोई
किसी से मोहब्बत करो तो वो समझता ही नहीं
हाँ मोहब्बत एक अहसास है
जो दिल की आस भी है और प्यास भी है
हाँ मोहब्बत समर्पण मांगती है
समर्पण से होती है सुरुआत इच्छाओँ की
शारीरिक भी और मानसिक भी
तभी तो ये दिल हर किसी के लिए नहीं धड़कता
पर किसी एक के लिए धड़कता जरुर है
हाँ तभी तो कहते हैं मोहब्बत बड़ी अजीब है

यूँ ही नहीं होती किसी से मोहब्बत मन की
मिल जाये जो मोहब्बत का मानसिक फलसफा
जो हो जाये मन की मोहब्बत किसी से
संग उसके, बेरंग दुनिया भी रंगीन नजर आती है
स्पर्श की अनुभूति लुभाये, जो हो मन की मोहब्बत
रोंम रोंम होता है प्रफ़ुल्लित, तनमन अति हर्षाये
ये मोहब्बत भी कितनी अजीब है जो मांगे समर्पण
मोहब्बत(प्रेम) से मोहब्बत का
मन मांगे मन का
तन चाहे तन का समर्पण
इन अहसासों का परिपूर्ण मिलन ही
है पूर्ण मोहब्बत
हाँ यही है सम्पूर्ण मोहब्बत
है न बहुत ही ये अजीब मोहब्बत।।

– सुबोध उर्फ़ सुभाष

Say something
No votes yet.
Please wait...

About the Author:

Leave A Comment