क्या मैं परीक्षा से डरता हूँ
या परीक्षा के परिणाम से
या फिर परिणाम को देख कर
मुझे नापने आंकने और भांपने वाली नज़रो से

साधारण से स्कूल का, साधारण सा छात्र हूँ मैं
बड़ी मुश्किल से
धीरे धीरे
डर निकला है मेरा।
अगर कुछ अच्छा करना चाहता हूँ,
आसमान छूना चाहता हूँ
तो ये विचार मेरा खुद का है
निज का है
इसकी असफलता पर निराशा मुझे होगी
तुम्हे क्या
ख़बरदार
ख़बरदार
जो तुमने आँख उठाई तो

मेरी कविता अच्छी है
या कैसी है
ये क्या तुम्हारी तालिया तय करेंगी?
तुम्हारी बातों से भ्रमित हो सकता हूँ मैं
दूर रहो मुझसे

मेरे मित्र कई है
मुझे बता देंगे क्या गलत है, कहाँ सही है
उन्होंने मेरी निर्धनता का मजाक नहीं बनाया
न ही मुझे, कभी छोटा और बुद्धिहीन महसूस कराया

तुम पक्का शर्मा अंकल हो
हर बच्चे के पडोसी
तुम्हारा बेटा
पहली कक्षा में ही कलेक्टर बन गया था
और आप से ही तो
पहली बार, या यों कहे बार बार
अतिशयोक्ति अलंकार का प्रयोग
सीखा था मैंने ।।

-भूपेन्द्र सिंह परिहार

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