भाग्य का विधान

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भाग्य का विधान

By |2018-01-20T17:07:32+00:00March 2nd, 2016|Categories: पंचतन्त्र|0 Comments

किसी नगर में सागरदत्त नाम का एक बनिया रहता था | एक बार उसके बेटे में सौ रूपए में एक किताब खरीदी | उसमें केवल एक ही श्लोक लिखा हुआ था | इस पर सागरदत्त अपने बेटे के ऊपर नाराज हो गया और उसे घर से निकाल दिया | अपने पिता के ऐसे व्यवहार से उसका पुत्र बहुत क्षुब्ध हुआ | वह न सिर्फ घर से ही निकाल गया, बल्कि उसने वह नगर ही छोड़ दिया | वह किसी दूसरे नगर में जाकर रहने लगा |

कुछ दिनों बाद उस नगर में एक व्यक्ति ने उससे उसका परिचय जानना चाहा बोला-“महाशय! आपका नाम क्या है और आप कहाँ से आए हैं?”

उत्तर में उस वैश्य-पुत्र ने सिर्फ इतना ही कहा-“मनुष्य अपने प्राप्तव्य को ही प्राप्त करता है |”

उसके बाद तो जो कोई भी उसका नाम पूछ्ता तो वह यही उत्तर देता | तब से लोग उसे ‘प्राप्तव्य’ के नाम से पुकारने लगे | वैश्व-पुत्र को विश्वाश को था कि जो भाग्य में है, वह अवश्य मिलता है |

कुछ दिनों के बाद उस नगर में एक उत्सव का आयोजन हुआ | उस उत्सव को देखने के लिए नगर की राजकुमारी चन्द्रावती भी अपनी सहेली के साथ वहां पहुंची | इसी बीच उसकी नजर किसी दूसरे नगर के राजकुमार पर पड़ी | राजकुमारी उस पर मोहित हो गई | तब उसने अपनी सहेली से पूछा-“सखी, जिस तरह भी हो सके इस राजकुमार के साथ मेरा मिलन करा दो |”

अपनी सखी चन्द्रावती की बात सुनकर वह राजकुमार के पास गई और उससे बोली-“मुझे राजकुमारी चन्द्रावती ने आपके पास भेजा है | यदि आप तुरंत उससे न मिले तो वह आत्म-हत्या कर लेगी |”

यह सुनकर राजकुमार बोला-“यदि ऐसी बात है तो मुझे बताओ मैं किस प्रकार उसके पास पहुँच सकता हूँ ?”

चन्द्रावती की सहेली बोली-“रात को राजकुमारी के शयनकक्ष के नीचे आपकों एक रस्सी लटकती हुई मिलेगी | आपुस पर चढ़कर चले आना |”

राजकुमार बोला-“ठीक है | मैं ऐसा ही करूँगा |”

रात को राजकुमार ने सोचा-“राजकुमारी से छिप कर भेंट करना अनुचित होगा, क्योंकि कहा गया है कि गुरु की पत्नी, मित्र की पत्नी, स्वामी या सेवक की पत्नी के साथ समागन करने से आप लगता है | ऐसा काम कभी नहीं करना चाहिए जिससे अपयश और अपमान हो |” यह सोचकर उसने राजकुमारी से मिलने का विचार त्याग दिया |

तभी उसी रात संयोगवश वह वैश्व-पुत्र ‘प्राप्तव्य-अर्थ’ उस ओर निकाल रहा था | जब उसने राजमहल के एक कक्ष से रस्सी नीचे लटकी हुई देखि तो वह उस पर चढ़कर राजकुमारी के कक्ष में पहुँच गया | राजकुमारी ने उसे वही राजकुमार समझा और बड़े मन से उसका आतिथ्य सत्कार किया और अपने पास बिठाकर कहा-“मैं आपके दर्शन मात्र से ही आपसे प्रेम करने लगी हूँ | मैं आपके सिवा किसी और का वरण नहीं करुँगी | लेकिन आप चुपचाप क्यों है कुछ बोलती वैश्व-पुत्र के मुख से सिर्फ यह शब्द निकले-“मनुष्य प्राप्तव्य वस्तु को प्राप्त कर ही लेता है |”

उसकी बात सुनकर राजकुमारी समझ गई की यह कोई दूसरा व्यक्ति है | तब उसने वैश्व-पुत्र को वह से भगा दिया | वहां से निकलकर वह एक टूटे-फूटे मंदिर में जाकर सो गया | उसी रात किसी समय अपनी प्रेयसी के संकेत पर नगर का रक्षक भी उससे मिलने उस मंदिर में आ पहुंचा | वैश्व-पुत्र को वहां मौजूद देखकर वह सकपका गया और उससे पूछा-“महाशय आप कौन है ?”

वैश्व-पुत्र ने वाही रटा-रटाया उत्तर दिया-“यह तो सुनसान जगह है | आप मेर स्थान पर जाकर सो जाईये |”

वैश्व-पुत्र ने उसकी बात स्वीकार कर ली | लेकिन उन्हीं अवस्था में होने के कारण भूल से वह उसके स्थान में न जाकर किसी अन्य के कन्या पर जा पहुंचा | वह स्थान किसी राज्याधिकारी का था | उसकी कन्या विनयवती भी वहां अपने प्रेमी है | उसने वैश्व-पुत्र की खूब खातिरदारी की और उसके साथ गन्धर्व विवाह कर लिया | लेकिन वैश्व-पुत्र को खामोश क्यों हैं ? मुझसे बातें क्यों नहीं करते ?”

वैश्व-पुत्र ने उसको भी वही उत्तर दिया-“मनुष्य अपने प्राप्तव्य को पा ही लेता है |”

यह सुनकर राज्याधिकारी की कन्या समझ गई कि उससे भूल हो गई है | यह उसका प्रेमी नहीं है | तब दुःखी होकर उसने वैश्व-पुत्र को दुत्कार कर वहां से भगा दिया | वैश्व-पुत्र एक बार फिर सड़क पर आ गया | सामने से एक बारात लेकर आ रहा था | वैश्व-पुत्र भी उस बारात में शामिल हो गया और बारातियों के साथ चलने लगा |

थोड़ी ही देर बार विवाह स्थल पर पहुंची, वहां उसका खूब स्वागत-सत्कार हुआ | विवाह का मूहूर्त होने पर सेठ की कन्या सज-धजकर विवाह मण्डप में पहुंची | तभी एक दुर्घटना घटित हो गई | एक हाथी अपने महावत को मार कर वहां आ पहुंचा और इधर-उधर दौड़ने लगा | यह देखकर बारातियों ने वर का हाथ पकड़ा और जान बचाने के लिए भाग खड़े हुए | कन्यापक्ष के लोग भी भागकर अपने-अपने घरों में घुस गए | विवाह मंडप में अकेली कन्या खड़ी रह गई |

कन्या को अकेला खड़ा देखकर वह वैश्व-पुत्र उसके पास पहुंचा और उसे सांत्वना देते हुए बोला-“डरो मत | मैं तुम्हारा रक्षक हूँ |” यह कर उसने दाहिने हाथ से कन्या का हाथ पकड़ लिया और डंडे की सहायता से हाथी को मारने लगा | संयोगवश हाथी भयभीत हो गया और वहां से चला गया | हाथी के चले जाने के बाद वरकीर्ति के बाराती भी मंडप में लौट आए | तब तक विवाह का मूहूर्त निकल चूका था |  वरकीर्ति ने जब देखा कि उसकी वधू का हाथ किसी अन्य के हाथ में है, और वह उसके साथ सटकर खड़ी है तो गुस्से में आ गया | वह कन्या के पिता से बोला-“आपने अपनी कन्या किसी और पुरुष के हाथ में दे दिया है | यह बहुत अनुचित बात है |”

कन्या का पिता बोला-“हाथी के डर से मैं भी आप लोगों के साथ यहाँ से भाग गया था | यह घटना किस प्रकार घट गई, इस बार में मैं कुछ नहीं जनता |”

वरकीर्ति ने पुनः क्रोधित स्वर में कहा-“मैं कुछ नहीं जानता | आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था |”

यह सुनकर कन्या के पिता ने उससे पूछा-“बेटी, सच-सच बताओ यहाँ क्या-क्या घटित हुआ था ?”

कन्या बोली-“पिता जी, इन्होंने ने हि आज मेरी जीवन रक्षा की है, अतः अब मैं इनको छोड़कर किसी दूसरे के साथ विवाह नहीं करूंगी |”

इस प्रकार वाद-विवाद और कहा-सुनी में सारी रात बीत गई | अगले दिन वहा भीड़ इकट्ठी हो गई | राजकुमारी चन्द्रावती भी वहां पहुँच गई | थोड़ी देर में राजा भी वहां भी पहुँच गया | उसने आते ही वैश्व-पुत्र से कहा-“युवक! तुम निर्भय होकर सारी घटना का विवरण सुना दो |”

उत्तर में वैश्व-पुत्र ने यही कहा-“मनुष्य प्राप्तव्य-अर्थ को ही प्राप्त करता है |”

यह सुनकर राजकुमारी बोली-“विधाता भी उसे नहीं रोक सकता |”

यह सुनकर उस राज्याधिकारी की कन्या विनयवती जो इससारे तमाशे को देख रही थी, बोल पड़ी-“इसलिए मैं बीती रात के लिए पश्चाताप नहीं करती हूँ और उस पर मुझे विस्मय भी नहीं होता |”

उन दोनों की बातें सुनकर विवाह मंडप में आई सेठ की कन्या बोली-“जो वस्तु मेरी है, वह दूसरों की नहीं हो सकती |”

राजा के लिए यह सब पहेली बन गया था | उसने तीनों कन्याओं से पृथक-पृथक सारी बात सुनी और जब आश्वस्त हो गया तो उसने सबको अभयदान दे दिया | उसने अपनी कन्या को सम्पूर्ण अलंकारों से सजाकर एक हजार गाओं के साथ अत्यंत मान-सम्मान के साथ प्राप्तव्य-अर्थ को समर्पित कर दिया |

इस प्रकार राजा ने उस वैश्व-पुत्र को युवराज के पद पर प्रतिष्ठित कर दिया | राज्याधिकारी ने भी प्रकार वस्त्राभूषणों से सुसज्जित कर अपनी कन्या को उसे सौंप दिया | सेठ की कन्या का हाथ तो वह विश-पुत्र पहले ही थाम चुका था | अतः सेठ की कन्या का विवाह भी उसके साथ हो गया | फिर प्राप्तव्य-अर्थं अपने सारे परिवार को अपने पास ले आया और आनंद से जीवन बिताने लगा |

यह कथा सुनकर हिरण्यक बोला-“मित्रों! इसीलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य अपने प्राप्तव्य-अर्थ को ही प्राप्त करता है | मनुष्य को जो वस्तु मिलनी होती है, वह उसे अवश्य मिलती है | यही भाग्य का विधान है जो भाग्यफल से प्राप्त हुआ है | जीवन के इन्हीं दुःखों के कारण मुझे वैराग्य हुआ है |”

यह सुनकर मंथरक ने उसे आश्वासन देते हुए कहा-“मित्र! नष्ट हुए धन की चिंता न करो | जवानी और धन का उपयोग क्षणिक ही होता है | पहले धन के अर्जन में दुःख है, फिर उसके शंताश कष्टों से भी यदि वह धर्म का संचय करे तो उसे मोक्ष मिल जाए | विदेश-प्रवांस का दुःख मत करो | व्यवसायी के लिए कोई स्थान दूर नहीं, विद्वानों के लिए कोई विदेश नहीं और प्रियवादी के लिए कोई पराया नहीं |

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