माँ(एक कविता)

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माँ(एक कविता)

By |2018-11-28T10:43:37+00:00November 28th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

ये कविता एक माँ के प्रति श्रद्धांजलि है। इस कविता में एक माँ के आत्मा की यात्रा स्वर्गलोक से ईह्लोक पे गर्भ धारण, बच्ची, तरुणी, युवती, माँ, सास, दादी के रूप में क्रमिक विकास और फिर देहांत और देहोपरांत तक दिखाई गई है। अंत में कवि माँ की महिमा का गुणगान करते हुए इस कविता को समाप्त करता है।

माँ

आओ एक किस्सा बतलाऊँ, एक माता की कथा सुनाऊँ,
कैसे करुणा क्षीरसागर से, ईह लोक में आती है?
धरती पे माँ कहलाती है।

स्वर्गलोक में प्रेम की काया, ममता, करुणा की वो छाया,
ईश्वर की प्रतिमूर्ति माया, देह रूप को पाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

ब्रह्मा के हाथों से सज कर, भोले जैसे विष को हर कर,
श्रीहरि की वो कोमल करुणा, गर्भ अवतरित आती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

दिव्य सलोनी उसकी मूर्ति, सुन्दरता में ना कोई त्रुटि,
मनोहारी, मनोभावन करुणा, सबके मन को भाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

मम्मी के आँखों का तारा, पापा के दिल का उजियारा,
जाने कितने ख्वाब सजाकर, ससुराल में जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

पति के कंधों पे निश्चल होकर, सारे दुख चिंता को खोकर,
ईश्वर का वरदान फलित कर, एक संसार रचाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

नौ महीने रखती तन में, लाख कष्ट होता हर क्षण में,
किंचित हीं निज व्यथा कहती, सब हँस कर सह जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

किलकारी घर में होती फिर, ख़ुशियाँ छाती हैं घर में फिर,
दुर्भाग्य मिटा सौभाग्य उदित कर, ससुराल में लाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

जब पहला पग उठता उसका, चेहरा खिल उठता तब सबका,
शिशु भावों पे होकर विस्मित, मन्द मन्द मुस्काती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

बालक को जब क्षुधा सताती, निज तन से हीं प्यास बुझाती,
प्राणवायु सी हर रग रग में, बन प्रवाह बह जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

माँ की ममता अतुलित ऐसी, मरु भूमि में सागर जैसी,
धुप दुपहरी ग्रीष्म ताप में, बदली बन छा जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

नित दिन कैसी करती क्रीड़ा, नवजात की हरती पीड़ा,
बौना बनके शिशु अधरों पे, मृदु हास्य बरसाती है।
धरती पे माँ कहलाती है।

माँ हैं तो चंदा मामा है, परियाँ हैं, नटखट कान्हा है,
कभी थपकी और कभी कानों में, लोरी बन गीत सुनाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

रात रात पर थपकी देती, बेटा सोता पर वो जगती,
कई बार हीं भूखी रहती, पर बेटे को खिलाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

जीवन के दारुण कानन में, अतिशय निष्ठुर आनन में,
वो ऊर्जा उर में कर संचारित, प्रेमसुधा बरसाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

शिशु मोर को जब भी मचले, दो हाथों से जुगनू पकड़े,
थाली में पानी भर भर के, चाँद सजा कर लाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

तारों की बारात सजाती, बंदर मामा दूल्हे हाथी,
मेंढ़क कौए संगी साथी, बातों में बात बनाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

जब जब चोट लगी जीवन मे, अति कष्ट हो तन में मन में,
तब तब मीठी प्यारी थपकी, जिसकी याद दिलाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

छोले की कभी हो फरमाइस, कभी रसगुल्ले की हो ख्वाहिश,
दाल कचौड़ी झट पट बनता, कभी नहीं अगुताती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

दूध पीने को ना कहे बच्चा, दिखलाए तब गुस्सा सच्चा,
यदा कदा बालक को फिर ये, झूठा हीं धमकाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

रोज सबेरे वो उठ जाती, ईश्वर को वो शीश नवाती,
आशीषों की झोली से, बेटे हो सदा बचाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

बच्चा लाड़ प्यार से बिगड़े, दादा के मुछों को पकड़े,
सबकी नालिश सुनती रहती, कभी नहीं पतियाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

छिपकिलियों से कैसे भागे, चूहों से रातों को जागे,
जाने सारी राज की बातें, पर दुनिया से छिपाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

पिता की निष्ठुर बातों से, गुरु के निर्दय आघातों से,
सहमे शिशु को आँचल में, अपने आश्रय दे जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

कभी डांटे, कभी गले लगा ले, स्नेह सुधा कभी वो बरसा दे,
सपनों में बालक के अपने, आंसू धोने आती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

पिता की नजरों से बचा के, दादा से छुप के छुपा के,
चिप्स, कुरकुरे अच्छे लगते, बच्चे को खिलाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

जब भी बालक निकले घर से, काजल दही टीका कर सर पे,
अपनी सारी दुआओं को, चौखट तक छोड़ आती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

फिर ऐसा होता एक क्षण में, दुलारे को सज्ज कर रण में,
खुद हीं लड़ जाने को तत्तपर, स्वयं छोड़ हीं आती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

जबतक जीवित माँ इस जग में, आशीषों से जीवन रण में,
अरिदल से करने को रक्षित, ढाल सदृश बन जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

बड़ी नाजों से रखती चूड़िया, गुड्डे को ला देती गुड़िया,
सोने चाँदी गहने सारे, हाथ बहु दे जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

फिर प्रेम बँटवारा होता, माँ बहू में झगड़ा होता,
बेटा पिसता कुछ कह देता, सबकुछ वो सह जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

ये बात सभी कुछ जाने वो, बहु को भी तो पहचाने वो,
हँसते हँसते ताने सुनती कुछ, बात नहीं कह पाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

बहू-माँ में जब रण होता है, बालक घुट घुट कर रोता है,
प्रेम अगन पे भारी पड़ता, अनबन खुद सुलझाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

बच्चों के जब होते बच्चे, दादी के नजरों में अच्छे,
जब बच्चों से बच्चे डरते, दादी उन्हें बचाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

परियों की फिर वही कहानी, दुहराती एक राजा रानी,
सब कुछ भूले ये ना भूले, इतनी याद बचाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

आँखों से दिखता जब कम है, जुबाँ फिसलती दांते कम है,
चिप्स, समोसे को मन मचले, खुद बच्चा बन जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

अब बिस्तर पे लेटी रहती, जब पोते को खाँसी होती,
खाँस खाँसके खाँसी के, कितने उपाय सुझाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

कितना बड़ा शिशु हो जाए, फिर भी माँ का स्नेह वो पाए,
तब तब वो बच्चा बन जाता, जब जब वो आ जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

उपाय न कोई चलता है, आखिर होकर हीं रहता है,
यम अधिनियम फिर फलता है, वो इह लोक छोड़ जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

जब भी उसकी याद सताती, ख्वाबों में अक्सर वो आती,
जन्मों का रिश्ता माँ का है, मरने के बाद निभाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

तूने ईश्वर को नहीं देखा होगा, लगता माँ के हीं जैसा होगा,
बिन मांगे हीं दग्ध हृदय को, प्रेम सुधा मिल जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

जिनके घर में माँ होती है, ना घर में विपदा होती है,
सास, ससुर, बेटे, बेटी की, सब चिंता हर जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

काश कि ऐसा हो पाता, ईश्वर कुछ पाने को कहता,
मैं कहता कह दे माता से, यहाँ क्यूँ नही आती है?
धरती पे माँ कहलाती है।

जननी तेरा अभिनन्दन, तेरे चरणों मे कर वन्दन,
गंगा यमुना जैसी पावन, प्रेम का अलख जगाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

माँ तो है बरगद की छाया, ईश्वर ब्रह्म तो उसकी माया,
ऋचाओं की गरिमा है माँ, महाकाव्य सा भाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

जन्नत है जहाँ माँ है मेरी, मन्नत मेरी हर होती पूरी,
क्या मांगु बिन मांगे हसरत, वो पूरी कर जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

जाओ तुम्हीं काबा काशी, मैं मातृ वन्दन अभिलाषी,
चारोंधामों की सेवा जिसके, चरणों मे हो जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

पुत कपूत सुना है मैंने, नहीं कुमाता देखा मैंने,
बेटा चाहे लाख अधम हो, वो माफ़ी दे जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

माँ जिनकी होती न जग में, जब पीड़ा होती रग रग में,
विचलित होते वे डग डग में, तब जिसकी याद सताती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

और कहो क्या मैं बतलाऊँ? माँ की कितनी बात सुनाऊँ,
ममता की प्रतिमूर्ति ऐसी, देवी छोटी पड़ जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

माँ को गर न जाना होता, क्या ईश्वर पहचाना होता?
जो ईश्वर में, जिसमे ईश्वर, जो ईश्वर हीं हो जाती है,
धरती पे माँ कहलाती है।

– अजय अमिताभ सुमन
:सर्वाधिकार सुरक्षित

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About the Author:

जीवन में बहुत सारी घटनाएँ ऐसी घटती है जो मेरे ह्रदय के आंदोलित करती है. फिर चाहे ये प्रेम हो , क्रोध हो , क्लेश हो , ईर्ष्या हो, आनन्द हो , दुःख हो . सुख हो, विश्वास हो , भय हो, शंका हो , प्रसंशा हो इत्यादि, ये सारी घटनाएं यदा कदा मुझे आंतरिक रूप से उद्वेलित करती है. मै बहिर्मुखी स्वाभाव का हूँ और ज्यादातर मौकों पर अपने भावों का संप्रेषण कर हीं देता हूँ. फिर भी बहुत सारे मुद्दे या मौके ऐसे होते है जहाँ का भावो का संप्रेषण नहीं होता या यूँ कहें कि हो नहीं पाता . यहाँ पे मेरी लेखनी मेरा साथ निभाती है और मेरे ह्रदय ही बेचैनी को जमाने तक लाने में सेतु का कार्य करती है.

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