हमदम का श्रृंगार

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हमदम का श्रृंगार

By |2018-11-28T10:20:30+00:00November 28th, 2018|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

उफ़ उनके श्रृंगार ने ये क्या कर डाला, 
हर चलते फिरते को यूँ जड़वत बना डाला|
माथे की बिंदिया फिर कहर ढाती रही,
यादें उनकी शाम-ओ-सहर आती रही|
झुमके कानों में उनके यूँ फबते रहे, 
जाने कितनों के दिलों में वो बसते रहे| 
नथनी ने ना जाने कितने बवाल मचा डाले, 
अच्छे अच्छों की नीयत पे सवाल उठा डाले| 
उनके हुश्न के आगे हर कोई गच्चा खा गया, 
देखो हार उनके गले पे कितना अच्छा भा गया|
कभी ताजमहल तो कभी दूधिया मूरत लगती है, 
मेरी जांनशीन गज़ब की खूबसूरत लगती है|
शुक्रिया अदा करता हूँ में रब की उस नेक नीयत का, 
इबादत में डूबा रहता हूँ उस फ़रिश्ते सीरत का|

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