सिंक गई रोटी राजनीति के काँटे की|
छिड़वा दी जंग एक खेत के दो मुल्ली में|
बस कहा, तू इस पांते की-तू उस पांते की|

हैं एक मृदा में पनपे हम|
विद्वेष रसायन किसने घोली|
भाईचारे के बीच में क्या जरूरत है नफरत की?
सिंक गई रोटी राजनीति के काँटे की|

है राजनीति बिन कंधे की|
वजह यही, लेता सहारा दंगे की|
है जरूरतमंद! कभी इस कंधे की,
कभी उस कंधे की|
सिंक गई रोटी राजनीति के काँटे की|

है दक्षता खड्डा खोदने की|
बखूबी आती कला इन्हें,
समाज बांटने की|
फिर देते क्यूँ मिथ्या-दिलाशा,
स्वनिर्मित-खाई पाटने की|
सिंक गई रोटी राजनीति के काँटे की|

न रहे वो लाल जिन्होंने मिट्टी पे कुर्बानी दी|
नवचेतना लाने में ताउम्र न्योछावर तन-मन की|
अब ठहरे वतन-घात, धोखाधड़ी व घोटालेबाज़|
पुजारी हैं ये! समाजवाद की आड़ में अलगाववाद की नीति की|
सिंक गई रोटी राजनीति के काँटे की|

– चंदन कुमार,
आत्मज वेद प्रकाश शर्मा

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