हिंदुस्तान के कोने-कोने की जुबानी हो गई है|
अब तो परदेश भी इसकी दीवानी हो गई है|
जी हाँ! हिंदी अब पुरानी हो गई है|

यथा समुंद्र में तरिणी प्रवाहित होती है,
विश्वस्तरीय भाषाखण्ड इसमे समाहित हो गई है|
जी हाँ! हिंदी अब पुरानी हो गई है|

शब्दों  के आभूषण से भारी हो गई है|
तलवार की धार से भी तीक्ष्ण,
इसकी व्यंग्य-वाणी हो गई है|
जी हाँ! हिंदी अब पुरानी हो गई है|

जटिलता है मगर बहु रोचक व प्यारी हो गयी है
इसकी उपन्यासें तो बंगाल की खाड़ी हो गयी है|
जी हाँ! हिंदी अब पुरानी हो गई है|

इसकी कविताएं व गीत,
मन मोह लेती है|
कहानियाँ व चुटकुले तो,
गमगीन होठों पर भी हँसी के स्रोत बन गयी है|
जी हाँ! हिंदी अब पुरानी हो गई है|

हिंदी हिन्दोस्ताँ की शान हो गयी है|
क्योंकि पूरी दुनियाँ में इसकी पहचान हो गई है|
हमे भी सम्मान की लाज रखनी है|
सरकारी दफ्तरों में भी हिंदी की कार्य-नवाजी है|
जी हाँ! हिंदी अब पुरानी हो गई है|

हमारी राष्ट्रभाषा अब अजय हो गई है|क्यूँकि आज का नारा जय हिंद! जय हिंदी हो गई है|जी हाँ! हिंदी अब पुरानी हो गई है| 

– चंदन कुमार,
आत्मज वेद प्रकाश शर्मा

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