संवाद अन्तर्मन से

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संवाद अन्तर्मन से

By |2018-11-30T23:08:58+00:00November 30th, 2018|Categories: लघुकथा|Tags: , , |0 Comments

‘कह तो रही थी कि जा रही हो| अब क्या हुआ?’
‘नहीं, डर-सा लग रहा है|’
‘क्यों डरती हो?’
‘नहीं, डरती तो नहीं हूँ| बस यूँ ही, जाने क्यों इस बार डर-सा लग रहा है| कहीं ये फैसला गलत ना साबित हो!’
‘हर बार यही कहती हो तुम|’
‘हाँ..कहती तो हूँ|’
‘फिर क्यों डर रही हो? कभी तो नहीं हुई कोई परेशानी?’
‘हाँ…परेशानी नहीं हुई कभी कोई| लेकिन फैसला गलत ही साबित हुआ है हर बार…
अन्तर्मन की वेदी पर ‘

– आकांक्षा

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Teacher, writer and social activist

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