झूठे मुखौटे (लघुकथा)

झूठे मुखौटे (लघुकथा)

साथ-साथ खड़े दो लोगों ने आसपास किसी को न पाकर सालों बाद अपने मुखौटे उतारे। दोनों एक-दूसरे के ‘दोस्त’ थे। उन्होंने एक दूसरे को गले लगाया और सुख दुःख की बातें की।
फिर एक ने पूछा, “तुम्हारे मुखौटे का क्या हाल है?”
दूसरे ने मुस्कुरा कर उत्तर दिया, “उसका तो मुझे नहीं पता, लेकिन तुम्हारे मुखौटे की हर रग और हर रंग को मैं बखूबी जानता हूँ।”
पहले ने चकित होते हुए कहा,”अच्छा! मैं भी खुदके मुखौटे से ज़्यादा तुम्हारे मुखौटे के हावभावों को अच्छी तरह समझता हूँ।”
दोनों हाथ मिला कर हंसने लगे।
इतने में उन्होंने देखा कि दूर से भीड़ आ रही है, दोनों ने अपने-अपने मुखौटे पहन लिये।
अब दोनों एक दूसरे के प्रबल विरोधी और शत्रु थे, अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेता।

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Dr Chandresh Kumar Chhatlani

नाम: डॉ. चंद्रेश कुमार छतलानी सहायक आचार्य (कंप्यूटर विज्ञान) पता - 3 प 46, प्रभात नगर, सेक्टर - 5, हिरण मगरी, उदयपुर (राजस्थान) - 313002 फोन - 99285 44749 ई-मेल -chandresh.chhatlani@gmail.com यू आर एल - http://chandreshkumar.wikifoundry.com ब्लॉग - http://laghukathaduniya.blogspot.in/ लेखन - लघुकथा, कविता, ग़ज़ल, गीत, कहानियाँ, बालकथा, बोधकथा, लेख, पत्र

This Post Has One Comment

  1. great writing…naked truth revealed

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