पत्थर कौन

उठेगा नहीं बेटा?
सुबह हो गई है, उठ जा।

सुबह हो गई! इतनी जल्दी सुबह क्यों हो जाती है माँ? अभी उससे कहो ना थोड़ी देर बाद आए।
सुबह कहाँ आती है बेटा, धूप निकलती है, हमारे लिए तो रात ही रात है। माँ की बड़ी-बड़ी बातें बच्चों के समझ में आती हों न हों पर चेहरे की लिखावट जरूर समझ में आ जाती है। बेटे ने आँखें खोली, पत्तियों के झुरमुट से बाहर झाँककर देखा और बोला वो फिर पत्थर मारेंगे ना? और तू मुझे लेकर भागेगी इधर उधर।’
चल आ। कुछ खाने की तलाश में चलते हैं।’ माँ ने बेटे की बात टालते हुए उसे पीठ पर बिठाया और चल दी।
इतने दिनों से यहीं हैं हम माँ..चलो ना अपने घर वापस..’
क्या रह गया है वहाँ?’ माँ झुँझला उठी पानी है? कुछ खाने को है? सब बंजर तो हो गया है।’ तभी एक घर के पीछे कुछ रोटियाँ फेंकी हुई दिखाई दीं। माँ दौड़कर उठा लाई और दोनों खाने लगे।
दो पल का ही तो दिख जाना भारी पड़ जाता है उनपर। देख लिया पत्थरदिलों ने उन्हें और पत्थर फेंकना शुरू। बच्चे को सीने से लगाए दौड़-भागकर किसी तरह कांरवा के प्रमुख के पास पहुँची तो चैन की साँस ली।
उस माँ और बेटे जैसे प्राणियों का, उनके साथियों का कारवाँ था। सब साथ ही आए थे यहाँ। कारवें का प्रमुख था उनका सबसे ताकतवर साथी, नाम जाने क्या रहा होगा, शायद सब साहब कहते हों उसे। जहाँ वो जाता, सब वहीं जाते। किसी पत्थर वाले की हिम्मत नहीं थी कि साहब पर पत्थर फेंक दे। भूल से फेंक भी दिया तो फिर शामत ही आ जाती।
भरी दोपहर में थोड़ी शान्ति थी। माँ बैठी पत्तियाँ तोड़ रही थी, या शायद चबा भी रही थी। बेटा उछल-कूद कर रहा था लेकिन माँ ने उसकी पूँछ को पैरों से दबा रखा था ताकि वो दूर न जा सके। कभी-कभी बड़ी खीझ होती थी बेटे को कि माँ खुद ही बताती है कैसे बचपन में अपने साथियों के साथ मस्ती करते करते वो यहाँ-वहाँ पहुँच जाती थी। फिर उन्हें ढूँढा जाता और जमकर डाँट भी पड़ती। मगर हम तो थोड़ी दूर भी नहीं जा पाते अपनी मर्जी से। हमेशा माँ की पीठ पर या गोद में। लेकिन क्या करता.. आसान भी तो नहीं इंसानों के बीच रहना।
वो जहाँ जाते, भीड़ उन्हें मारने पहुँच जाती। वो थोड़ी उछल कूद करते, लोग डंडे लेकर आ जाते। वो कुछ खाते, लोगों को बहुत बुरा लगता। लगेगा ही, उनका अपना नुकसान जो होता था।
अजीब बात है ना। इनका बसेरा उजाड़ते जा रहे हैं हम। तभी तो ये कभी-कभी नहीं, हमेशा दिखते हैं। कहाँ जाएं ये..हमारे गाँवों में आ गए तो हमे लगता है कि इन्होंने हमे परेशान कर रखा है। हम चिढाते हैं इन्हें, पत्थर मारते हैं…और इनकी जरा सी खीझ बहुत बुरी लगती है हमें। दो रोटियाँ दे दीं या पानी पिला दिया तो समझते हैं कि बहुत अहसान कर दिया हमने…जबकि इनकी इस हालत के जिम्मेदार हमीं हैं।
क्यों? क्या पत्थर हो चुके हैं हम? या आदत हो गई है हमें पत्थर फेंकने की, जो इन बेजुबानों का दर्द समझने के बजाय चिढ़ते और हँसते हैं। जाने कौन श्रेष्ठ है- हम या ये बंदर… ।

-आकांक्षा

Rating: 1.0/5. From 1 vote. Show votes.
Please wait...

akanksha

Teacher, writer and social activist

Leave a Reply

Close Menu