देश की स्वतंत्रता का आज ऐसा हाल है
जिंदगी की दौड़ में तो पैसों की ही चाल है
हर तरफ सिसकारियो से गूंजता है मन मेरा
किस तरह सुख आयेगा ये सोचता है मन मेरा
साधता ख़ामोशियों को वो ही सब का लाल है
जिंदगी की दौड़ में तो पैसों की ही चाल है

वो दूसरों का पेट भरके मर रहा है आजकल
जिंदगी की जंग लड़ के मर रहा है आजकल
चंद पैसों के लिये ही जिंदगी को मारता
रात दिन करके वो मेनत जीतकर भी हारता
कौन अब किसको बचाये इक यही सवाल है
जिंदगी की दौड़ में बस पैसों का ही जाल है

इक तराजू के दो पलड़े इक है स्त्री इक पुरुष
एक हलका इक है भारी कैसा है ये युगपुरुष
क्या करे भगवान बन्धू वो तो इक अनुमान है
जो करे इंसान कुछ भी बस वही भगवान है
गर बचाओगे जो कल को तो बचेगा साल है
जिंदगी की दौड़ में बस पैसों की ही चाल है

इक तरफ सूखा तबाही इक तरफ बरसात है
देश की स्वतंत्रता की इक यही तो बात है
कट रहें हैं पेड़ पौधे बह रही दूषित हवा
फिर भी सब बीमारियों से लड रही नकली दवा
मौत के तांडव से लडता हम सभी का काल है
जिंदगी की दौड में बस पैसों की ही चाल है

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