जगह-जगह प्रलय का हाहाकार है|
ओ ऊपर तरस खा|
तूने हीं रचा ये संसार है|

कहीं बाढ़, भूकंप, तो कहीं ज्वालामुखी खूंखार है|
इसके आगोश में हर इंसा बना बेबस-लाचार है|
जगह-जगह ……….हाहाकार है|

न जाने मांग कितनी उजर रही,
है कितनी गोद सूनी हो रही|
बचा तबाही के मंजर से,
बस तेरे रहम की दरकार है|
जगह-जगह ……….हाहाकार है|

जाती-धर्म के चक्रव्यूह में उलझ चुका संसार है|
कूटनीति के दलदल में फँसा पड़ा जगसार है|
जगह-जगह ……….हाहाकार है|

ईर्ष्या-द्वेष और पाप जहाँ में धर रहा रूप विकराल है|
देख तेरी दुनिया मे न एकता है न प्यार है|
जगह-जगह ……….हाहाकार है|

ऊपर वाले कुछ ऐसा कर!
बरपा सिर्फ पापियों पर प्रलय कहर|
रा विचित्र संसार है|
जगह-जगह ……….हाहाकार है|

– चंदन कुमार,
 आत्मज वेद प्रकाश शर्मा, 

No votes yet.
Please wait...