बचपन की एक स्मृति

छोटा था, शायद दूसरी या तीसरी कक्षा में पढ़ता था ।
उन दिनों घरों के इंटीरियर डेकोरेशन के नाम पर देवी-देवताओं के जिनमें खासकर राजा रवि वर्मा के चित्रों के प्रिंट, कैलेंडरों के चित्र व दादा-दादी और बुजुर्गों के फोटो या चित्रों को मंडवा के छत और दीवार के बीच लकड़ी की पट्टी पर एक जैसा 45° के कोण पर कमरे एक सिरे से दूसरे सिरे तक लगाकर सजाया जाता था। कहीं-कहीं कुछ सीनरी के चित्र भी होते थे, जिनके विषय अक्सर झील के किनारे हट, चांदनी रातों में जंगल, पहाड़ों से उगता सूरज और खजूर के पेड़ भी कहीं-कहीं दिख जाते थे। इन चित्रों की एक अलग ही दुनियां थी ।

हां याद आया, उन दिनों एक बड़ा ही प्रचलित मरफ़ी रेडिओ के कैलेंडर पर छपने वाले बच्चे का फोटो था, जो होंठ के पास ऊंगली रखकर, कैलेंडर के बाहर झांकता सा लगता था। घर में लोग बड़े ही शान से इसको मंडवा के लगाते थे।
यही सब कुछ प्रिंट, फोटो, चित्र घर की बैठकों व कमरों में उस समय लगे रहते थे।
मेरी उम्र के आस-पास के सभी लोगों को आज भी ये बात मालूम है।
मेरे घर की बैठक व कमरों में भी कुछ-कुछ ऐसा ही था।

लेकिन, मेरी मां के कमरे की पलंग के सामने वाली दीवार पर बीच से थोड़ा ऊपर कील से एक ही फ्रेम टंगी थी, जिस पर कोई चित्र नहीं था, बस कुछ लिखा हुआ था।
मैंने कभी उसे गौर से देखा भी नहीं, नाहिं उसने ही कभी मुझे अपनी तरफ आकर्षित किया ।

बरसात के दिन थे, स्कूल की छुट्टी के बाद घर आते समय बहुत तेज बारिश होने लगी, बरसाती के बावजूद और कुछ अपनी भीगने की इच्छा के कारण घर आते-आते, पूरी तरह भीग गया था।

घर में सबसे छोटा था, मां के बहुत
करीब था, मां ही मेरी दुनियां थी।
सीधा मां के कमरे में गया, मां ने तुरंत मेरे कपड़े उतारे, तौलिए से मेरा बदन पोंछा, नये कपड़े पहनाए, भीगने की वजह से ठंड लग रही थी। मां मेरे लिए खाना लेने के लिए जाने लगी, मैंने मां को रोका, कहा, थोड़ा रुककर खाऊंगा, पहले थोडा गरम हो जाऊं।

मां ने अपने बिस्तर पर अपनी गोद में मेरा सिर रखकर मेरे बदन पर चादर ओढ़ादी और मेरे सिर पर स्नेह की थपकी देते हुए, काश्मीर की प्रसिद्ध संत लल्लेश्वरी के लल
वाक् गुनगुनाने लगीं जो वो अकसर गाती थी।
मेरा सिर दीवार पर लगी उसी फ्रेम की ओर था जिस पर लिखे शब्दों को मैंने कभी गौर से नहीं देखा था। वो फ्रेम ठीक मेरे सामने थी। उस पर ‘संतोषी’ जैसा कुछ लिखा था । जो लगभग नेमप्लेट पर लिखे नाम जैसा था।
मैंने मां की लल-वाक की धुन तोड़ते हुए जोर देकर पूछा ये नेम प्लेट कमरे के अंदर क्यों लगा रखी है? ये तो बाहर दरवाजे पर होना चाहिए।
मां ने मेरी तरफ देखा फिर फ्रेम की तरफ देखा फिर मेरी तरफ देख कर कहा बेटा ये नेम प्लेट अंदर ही लगनी चाहिए ।
मां तो रही नहीं, अब मैं बड़ा हो गया,दो जवान बच्चों का पिता …..
सच ही कहती थी मां , ये नेम प्लेट
तो, अंदर ही लगनी चाहिए, जिस पर लिखा था….
।। संतोषी सदा सुखी ।।

– अमित गंजू
निदेशक
स्कूल ऑफ फाइन आर्ट्स
आईपीएस अकादमी, इंदौर

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