एक दिन किसी पंडित जी से मुलाकात हो गयी,
बड़ी उत्सुकता से देखा हमें और शुरू उनकी बात हो गयी |
बुझे बुझे से दिखते हो क्यों लटके हुए मनोभाव हैं,
हमें तो लगता हैं आप पर किसी कुदृष्टि का प्रभाव है |
अनदेखा न करें इसका दोष निवारण करना होगा,
कुछ वस्तुओं का दान तुम्हें मुझको समर्पण करना होगा |
गृह शांत करवाने होंगे, एक पूजा भी रखवानी होगी,
मुझको भरपेट खिलाना होगा, थोड़ी दक्षिणा चढ़ानी होगी |
उपर्युक्त उपायों से तुम्हें मुक्ति मिल जाएगी,
भर जायेंगे भण्डार तुम्हारे लक्ष्मी जी घर आयेंगी |
बड़ी जोर की हंसी आयी पंडित जी के विचारों पे,
जैसे लक्ष्मी जी के यही दूत हैं दौड़ी आयेंगी उनके उपचारों से |
मैंने कहा पंडित जी ये कैसा निवारण है, ये कैसे उपाय हैं,
क्या लक्ष्मी जी आजकल हो गयी इतनी असहायं हैं |
मत बनाओ मुझे बेवकूफ इतनी समझ तो है मुझको,
बंद करो ये ढोंग दिखावा क्यों शर्म नहीं आती तुमको |
लक्ष्मी जी के दूत बने ठगते हो भोलेभालों को,
सच्चे मन से राह दिखाओ तुम दुनियावालों को |
अगर करना ही है दान मुझे तो किसी भूखे को खिलाऊंगा,
किसी निर्वस्त्र के नंगे बदन पे नए कपड़ें चढ़ाऊँगा |
मेरे गृहदोष बुझा चेहरा सब सही हो जायेंगे,
लक्ष्मी जी को तो नेक नीयत के यही उपाय भायेंगे |

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