मैं डरती हूँ
– एकता गुप्ता
मैं डरती हूँ,
मुझे लगा
कुछ बुदबुदायी
साफ़ सुन पाती उससे पहले ही
उसने फ़िर कहा,
पिछली बार से कुछ ज्यादा तेज के साथ,
हाँ मैं डरती हूँ,
एक अचम्भित-सी दृष्टि मैंने उस पर डाली,
उसने कहा,
हां तुमने ठीक सुना,
मैने कहा – मैं डरती हूँ,
मैं कुछ समझ पाती,
शब्दों के काफिले सजा, कुछ कह पाती, उससे पहले ही शब्द निकल पडे,
कब?क्यों?
ये सुन
उसने झट पूछा -सुन सकोगी तुम?
शायद वो मेरी अधिरता जानती थी,
मेरे उत्तर की प्रतीक्षा किए बगैर
उसने कहना शुरू किया…
शायद वो मेरी उत्सुकता को भांप  रही थी,
हां मैं डरती हूँ
उसने फ़िर दोहराया,
जैसे मुझे पूर्व सूचित कर रही हो,
आगे की कथा के श्रवन योग्य बना रही हो,
मैं डरती हूँ,एक आहट से,
पत्तों की सरसराहट से,
कभी अँधेरे से,
तो कभी उजाले से,
मैं डरती हूँ,
कभी यूँ ही रिश्ते बन जाने से,
तो कभी यूँ ही उनके टूट कर बिखर जाने से,
कभी अचानक किसी के आ जाने से,
तो कभी किसी के दूर चले जाने से,
मैं डरती हूँ
रिश्तों में प्रगाढता बढ जाने से,
तो कभी रिश्तों के बिखर जाने से,
दुख के आने से,
तो कभी एक साथ कई खुशियां मिल जाने से,
कहते – कहते उसने एक दृष्टि मुझ पर डाली,
मेरे धैर्य का परिक्षण कर रही हो  जैसे,
कुछ आश्वस्त-सी
उसने फ़िर कहना शुरू किया…
हां मैं डरती हूँ,
राहों पर चल रही भीड़ से
तो कभी राह के सन्नाटे से
कभी अपनी विफलता से
तो कभी सफलता से
उसने फ़िर एक दृष्टि मुझ पर डाली,
इस बार मेरी भी दृष्टि उस पर पडी,
और ज्यों ही दोनों की नज़रें मिली,
बिना पूर्व सूचना के,
मेरे होठों से चंद बिखरे-बिखरे से शब्द फूट पडे,
“हा तो फ़िर”,
एक क्षण वो मौन रहीं,
फिर अधरों को हिला थोडा मुस्कुराई,
जैसे मेरी असमंजसता को वो जान रही थी,
उसकी इस प्रतिक्रिया को देख
मैं फ़िर दोहरायी
“हां तो फ़िर”
उसके अधर फ़िर थोडा हिले
जैसे इसी उत्सुकता की प्रतीक्षा में वो हों
एक गहरी सांस ली उसने
और कहा,
“फिर भी मैं आगे चलती हूँ “|
– एकता गुप्ता-

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