वो_आएंगे?
‘अरे! फिर वहीं नजर टिका कर खड़ी हो गई? तू देख क्या रही है बाहर? आ जरा मदद कर मेरी’
‘आज इतवार है ना माँ?’
‘हाँ…तो?’
‘नहीं…कुछ नहीं’
‘चार इतवार बीत गए और तू अब भी राह देख रही है कहा ना मैने कि वो लोग अब नहीं आएंगे’
‘आएंगे माँ ! वो लोग कह रहे थे ना कि वो सबके जैसे नहीं हैं| वो बहुत दिन तक हमारे पास आएंगे इतवार-इतवार को| हमे बहुत सी चीजें बनना और करना सिखाएंगे| ढेर सारी कविता कहानियाँ और बातें भी…’ कहते-कहते यासमीन चहकने लगी और फिर बाहर देखने लगी जैसे वो आने ही वाले हों|
ये छोटी सी बच्ची और उसकी अम्मी जाने समझती थीं या नहीं इस बात को कि वे इन झुग्गियों में अवैध रूप से रहने वाले रोहिंग्या हैं| कोई समाजसेवी कब तलक और क्योंकर उनका खयाल रखेगा|

-आकांक्षा

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