तेरे लबों से छलकता जाम हूँ मैं

तेरे लबों से छलकता जाम हूँ मैं

तेरे लबों से छलकता जाम हूँ मैं
कोई न कर सके वो काम हूँ मैं
जो दिलो को सुकून ए शबाब बनाए
ऐसे नयनो का पैगाम हूँ मैं
साहिल लहरों को जहाँ तरसते है

ऐसे मंज़र में अवाम हूँ मैं
विरह की वेदना दर्द देती है मुझे
ऐसी हालत में पीड़ा का कलाम हूँ मैं
तन्हा दिल कब सुकून पाता है

टूटे दिल का निज़ाम हूँ मैं
ख़ुदा करें सबको बरकत दे
ऐसी सोच का अंजाम हूँ मैं
आवारागर्दी बहुत बढ़ गई है

उसे मिटाने का इंतकाम हूँ मैं
दर दर ठोकर खाकर ये जाना
जिंदगी की तपती धूप में शाम हूँ मैं

स्वरचित:-पंकज देवांगन

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