क्या सच में

क्या सच में

शुक्रवार देर रात पार्टी के बाद बस घर लौटे ही थे की अचानक मेरे दोस्त बबलू को हिचकी शुरू हो गयी। 5 दिन ऑफ़िस में काम करने के बाद हर शुक्रवार की रात हम दोनो बाहर जाते थे कभी सीनेमा तो कभी किसी और दोस्त के घर मौज मस्ती करने। वीकेंड कैसे निकल जाता था पता ही नहीं चलता था। ख़ैर उस शुक्रवार कुछ और ही होने वाला था। साधारणतया अगर कभी किसी को हिचकी आती है तो मुश्किल से 5-10 मिनटों के लिए।

बचपन में जब हिचकी आती थी तो दादी माँ ज़ोर से डाँट लगा देती थी की क्या चुरा कर खाया है तुमने और हम सफ़ाई पेश करने लगते थे, थोड़ा ध्यान भटकता और हिचकी ग़ायब। कभी कभी पानी पी कर भी हिचकी भगा दी जाती थी। बहुत ही सटीक होते थे दादी माँ के नुशखे।

आधा घंटे होने को था और बबलू की हिचकी जाने का नाम नहीं ले रही थी। डाँटने वाला नुशखा भी काम नहीं आया, उलटा वो मुझ से लड़ने लगा। पानी भी 5-7गिलास पिला दिया लेकिन बात बन नहीं रही थी। रात बीत रही थी 2घंटे से ऊपर हो गए थे लेकिन हिचकी जस की तस। गर्ल-फ़्रेंड  की क़सम तक काम नहीं आयी।

अजीब समस्या थी, इसको आप ना तो आपातकालीन स्तिथि में शामिल कर सकते हैं और ना ही साधारण ही मान सकते हैं। मैंने बबलू से पूछा बोलो तो चलें डॉक्टर के यहाँ। उसने ना में सिर हिलाया और बोला थोड़ी देर और देखतें हैं। इससे पहले ऐसा ना कभी सुना था और ना देखा, समझ नहीं आ रहा था की करूँ क्या। शनिवार की सुबह हो चुकी थी, ऑफ़िस तो जाना नहीं था सो मन में थोड़ी शांति थी, लेकिन वीकेंड का प्लान चौपट हो चुका था।

अचानक गूगल देव का ख़याल आया, लेकिन एक बार को मन में शंका आयी की क्या ये सब की जानकारी होगी गूगल देव के पास? तभी टीवी वाला प्रचार याद आया “पूछ डाला तो लाइफ़ झींगा-लाला”। हमने भी गूगल पर सर्च किया “हाउ टू क्यूर हिकप?” परिणाम सामने थे, अचम्भित तो था में लेकिन ख़ुशी इस बात की थी की कुछ जानकारी मिली वहाँ से। एक-एक करके हमने सारे प्रयोग करने शुरू किए। कुछ का अच्छा परिणाम आया लेकिन कुछ घंटो के बाद हिचकी फिर से शुरू हो गयी। बबलू भी अब तक व्याकुल हो चुका था सारे के सारे प्रयोग करते करते।

इसी बीच हम डॉक्टर से भी मिल आए थे लेकिन उसकी दवायियाँ भी बे-असर थी। रविवार की सुबह हो चुकी थी, पिछले 36घंटो में क़रीब क़रीब सिर्फ़ 6-7घंटे उसको हिचकी नहीं हुई थी। सारे विकल्प देख चुके थे लेकिन हिचकी माता भी अडिग थीं अपने जगह, लेकिन समाधान तो ढूँढना ही था। किताबों में पढ़ी सारी पुरानी बातें एक-एक करके याद आ रहीं थी। मसलन “हिम्मत करने वाले की हार नहीं होती”,“ढूँढने पर तो भगवान भी मिल जाता हैं”। एक बार फिर कोशिश की और गूगल देव का आहवाहन किया। इस बार एक और नया उपाय दिखा, प्रयोग किया और परिणाम हमारे हित में  था। बबलू की हिचकी जाती रही, 48घंटे के कुश्ती के बाद।

अगर आपको बचपन की कहानियाँ याद हों तो ये भी याद होगा हर कहानी के पीछे एक सोच, एक सिख होती थी अपने जीवन को बेहतर से बेहतर बनाने के लिए। पंचतंत्र की कहानी, तेनालीराम की कहानी और दादी-दादा वाली कहानी। और जो अभी अभी आपने पढ़ा है वो तो आपबीती है लेकिन इसके पीछे की सिख क्या है?

उस दिन “शेयरिंग इस केरिंग” का असल मतलब पता चला। जब डॉक्टर की दवाई भी काम नहीं आ रही तब किसी अनजान व्यक्ति के द्वारा दी गयी जानकारी काम आयी। जानकारी देने वाले को क्या पता की कौन, कहाँ, कब, और कैसे उसके द्वारा दी गयी जानकारी किसी की जान बचाने वाली है। आज हम हर छोटी-मोटी बात गूगल और यूटूब से पूछ बैठते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है की गूगल ही हमारी मदद कर रहा या कोई और?

गूगल और यूटूब तो सिर्फ़ माध्यम भर हैं , असल जानकारी तो आप और हम जैसे लोग ही विडीओ, ऑडीओ, लेख और ब्लॉगिंग के ज़रिए देते हैं। लेकिन एक भारी समस्या ये है ज़्यादातर लोग जानकारी का उपयोग करते हैं। ऐसे लोगों का प्रतिशत बहुत ही कम है जो अपना क़ीमती समय निकाल रोचक और दूसरों को मदद करने वाली जानकारियाँ दूसरों के साथ साझा करते हैं। समय बदल चुका है, तकनीकी का उपयोग कर जानकारी साझा करना कोई मुश्किल काम नहीं रहा अब, आपके पास अगर स्मार्ट फ़ोन है तो भी बहुत हैं। मैं तो ज़िंदगी की ये सीख आत्मसात कर रहा हूँ और पूरी कोशिश है की ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की मदद कर सकूँ अपने लेख, ऑडीओ और विडीओ के माध्यम से।

आपसे भी यही उम्मीद है, और ऐसा तो क़तई ना सोचें की आपके पास कुछ नहीं है दुनिया से साझा करने के लिए। बस एक बार अपने भीतर झाँक कर देखिए तो।

“शेरिंग इस केरिंग”

 

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