संबोधन – एक अनुभव
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संबोधन – एक अनुभव

अगर आप कभी नई-दिल्ली रेलवे स्टेशन गए हों तो आपको पता होगा कि वहां अब स्टेशन में प्रवेश से पहले आपका सामान स्कैन किया जाता है जैसे कि मेट्रो ट्रेन में होता है और अगर नही पता तो मैं आपको बता देता हूँ। कभी-कभार एक आध बैगेज चेक किये जाते हैं।

उस दिन मैं लाल टीशर्ट, नीली जीन्स और काले रंग का बैग लिए स्टेशन पहुंचा। बड़ी ही लंबी कतार लगी थी, जैसे तैसे अपना इकलौता बैग स्कैन मशीन में डाल दूसरी तरफ बैग का इंतज़ार करने लगा। खाकी वर्दी वाले बड़ी ही सावधानी से अपना काम कर रहे थे। जैसे ही मुझे मेरा बैग दिखा, मैंने तपाक से उठाया और निकल पड़ा प्लेटफॉर्म का पता करने की मेरी ट्रेन कहाँ आने वाली है। तभी पीछे से आवाज आई। वहां तकरीबन 15-20 लोग थे, लेकिन बुलाने का तरीका इतना सटीक था कि 15-20 लोगों में से मैं ही पीछे मुड़ा।

जान पहचान और अनजान लोगों को संबोधित करने के तरीके अलग अलग होतें हैं। अगर आप किसी मित्र को आवाज लगातें तो आप उसे उसके नाम से बुलाते हैं, वैगेरह-वैगेरह। समस्या अनजान लोगों को संबोधित करने में होती है। जैसे हर महिला रिक्शे वाले को भैया ही बुलाती है। भाई साहब और बहन जी कुछ और उदाहरण हैं संबोधन के। लेकिन उस दिन जिस संबोधन से मुझे आवाज लगाई गई वो अविश्वसनीय था।

वो नीली जीन्स वाला या लाल टीशर्ट वाला कह कर भी तो बुला सकता था। मगर नही, वो तो मखोल के मूड में था।

“अरे ओ टकलू भैया, क्या है आपके बैग में?”

लेकिन जब मैं मुस्कुराते हुए उसकी ओर पलटा तो वो भी मुझे देख मुस्कुरा रहा था।

वो थोड़ा झेंप गया था लेकिन अपनी हंसी भी नही रोक पाया।

इस तरह का सम्बोधन मेरे लिए नया था लेकिन मुझे बिल्कुल भी बुरा नही लगा।

खुशी हुई की हम भी किसी के चेहरे की मुस्कुराहट बन पाए।

लोग खांमखां ही बेबात किसी से भी लड़ पड़ते हैं और तिल का ताड़ बना देते हैं।

अगर आप किसी के खुशी का कारण बन पाए तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है।

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