सर्द होती रातें

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सर्द होती रातें

By |2019-01-06T16:56:29+00:00January 6th, 2019|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

सर्द होती ये रातें
कोई ओडे़ कंबल
कोई आग है तापे
जाड़े से बचने हेतू
ओड के लिहाफ
रुम हिटर है चलाए
जो थोड़ा संपन्न है
वह शरीर को गर्म रखने
ख़ातिर मेवा है खाए
ये सब तो सही है साहब लेकिन
सोचो थोड़ा उनके बारे भी जनाब
जो गरीब बेसहारा और अनाथ है
कैसे वो कड़ाके की सर्द रात बिताए
सर पर छप्पर नही हाथ मे बिस्तर नही
गहराती सर्द रात से सड़क पर खुद को बचाए
मजबूर और गरीब है कहीं तड़प कर मर न जाए
इंसानियत के नाते ही सही थोड़ा सा तो रहम दिखाएं
ज्यादा कुछ नही पुराने ही सही गर्म लत्ते और कंबल
जो पड़े हो फालतू वो ही इन जरूरतमंद को दे आएं
ढूंढते फिरते हो खुदा को दर दर कितना पैसा है लुटाते
किसी मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे मे उनके दर्शन है तुम पाते
फिर भी मन की शांति के लिए व्यर्थ ही दान कर आते
जनाब इन गरीबों के दिल मे भी तो ईश्वर है समाते
यही समझ कर फिर क्यों इनकी मदद को हाथ नही बढ़ाते
हर बरस न जाने कितने लोग ठंड के चलते है जान से जाते
इन लावारिसों की लाश देख क्यों नही ये दिल पसीज जाते
शायद ये छोटी सी कोशिश किसी का जीवन बचा दे…

– निखिल कुमार अंजान

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