मेरी मनुहार कान्हा से

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मेरी मनुहार कान्हा से

By |2019-01-02T12:20:00+00:00January 2nd, 2019|Categories: कविता|Tags: , , |0 Comments

कान्हा देखो बहुत हो चुका अब ज्यादा ना इतराओ,
कब से तुम्हें पुकार रही हूँ अब मेरे घर भी आ जाओ।
लटका दिये हर कोनों पर मैंने मटके माखन के,
द्वारों से भी हटा दिये हैं ताले मैंने अपने आँगन के।
लेके साथ सभी सखों को माखन खाने आ जाओ,
कब से तुम्हें पुकार रही हूँ अब मेरे घर भी आ जाओ।

नहीं करूँगी तेरी शिकायत मैं यशोदा मइया से,
छिपा जाउँगीं हर बात मैं फिर दाऊ भइया से।
कभी तो इस भक्तिन के गीतों मे भी समा जाओ,
कब से तुम्हें पुकार रहीं हूँ अब  मेरे घर भी आ जाओ।

रास रचाते हो बहुत जोर का राधा जी के साथ में,
ब्रज बालायें भी थिरकती रहतीं मुरली के उस गान पे।
मेरे ब्याकुल कानों को भी मधुर गान सुना जाओ,
कब से तुम्हें पुकार रहीं हूँ अब मेरे घर भी आ जाओ।

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